अस्तित्व विचारशील होने का अहसास

ये जीवन के अनुभव, विचार, दर्शन और कभी-कभी कहानी के तौर पर अभिव्यक्ति है, बस...।

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amita neerav


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उम्र की नोटबुक… !

Posted On: 17 Apr, 2012  
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इंसान से बेहतर हैं जानवर…

Posted On: 12 Apr, 2012  
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फेसबुक पर की गई जुगाली…

Posted On: 29 Mar, 2012  
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लोकल टिकेट में

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नवीन के स्वागत का पर्व गुड़ी पड़वा

Posted On: 23 Mar, 2012  
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स्वागतम् ऋतुराज…!

Posted On: 28 Jan, 2012  
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यहाँ सादगी अश्लील शब्द और भूख गैर-जरूरी मसला है

Posted On: 23 Jan, 2012  
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उसकी क़ुर्बत (नजदीकी)

Posted On: 21 Jan, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

शालिनीजी ये बहुत मासूम और अपरिपक्व सोच है। ये किसने कहा कि ब्राह्मणों को दिया हुआ भगवान तक पहुँचता है! क्या आप ये मानती हैं कि हमारे सारे ग्रंथ खुद 'ईश्वर' ने रचे हैं...? यदि हाँ तो फिर कहना पड़ेगा कि आप भी बरसों से चली आ रही परंपरा का ही हिस्सा है। परंपरा ने आपको इस कदर जकड़े रखा है कि आप तर्क और बुद्धि का इस्तेमाल ही भूल गई हैं। मुझे माफ करेंगी ये कहने के लिए कि सवाल उठाएँ, जो जवाब मिलेंगे वो आपको चौंकाने लगेंगे। यदि आप सामाजिक षड़यंत्र को ईमानदारी से समझना चाहती हैं तो, अन्यथा जो आप सोचती हैं, वही इस देश के खून में चला आ रहा है... तो फिर ऐसे ही सब कुछ चलता भी रहेगा। एक बार फिर स सोचिए...

के द्वारा: amita neerav amita neerav

प्रकृति और मौसम से इंसान का रिश्ता कितना अनूठा है और ये भी कि बिना इसके इंसान का वजूद नामुमकिन है, इसलिए इसके साथ हमें दोस्ती का रिश्ता निभाना ही होगा, जिम्मेदारी और सम्मान का भी। तभी तो हमारे पर्व-परंपराओं में चाहे धर्म और अर्थ ही प्रत्यक्षत: दिखाई देते हों, कहीं बहुत गहरे इनमें मौसम और प्रकृति ही होगी। यहां मुश्किल ये है कि हम परंपराओं का निर्वहन न मन से कर रहे हैं और न बुद्धि से… यदि दोनों में से कोई एक भी चीज होती तो हम दूध बहाकर, सांपों को दूध पिलाकर, पेड़-पौधों को काटकर अपनी आस्था को आधार देने की बजाए यह जानने की कोशिश करते कि आखिर इन परंपराओं का मूल स्रोत क्या है? और इनका दर्शन क्या है? तभी हम न्याय कर पाएंगे धर्म से, समाज से, पर्यावरण से और खुद के इंसान होने के तथ्य से भी। सार्थक लेख, बधाई आदरणीया सादर

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

ये सवाल जब उसने बचपन में ही किया था तो जवाब देने वाला गफ़लत में आ गया था। स्वर्ग उसमें ठंडी-ठंडी हवाएँ बहती है, झरने बहते हैं, खूबसूरत फूल खिलते हैं, मद्य (सीधे कहते हुए भावना अकड़ी जाती है- दारू…) और सुंदरी…। उसने मान लिया, लेकिन उस दिन जब उसने कड़ियाँ जोड़ी तो सवाल उठा – ‘ये सब तो पुरुषों के लिए हैं, हम महिलाओं के लिए स्वर्ग कैसा है।’ जवाब था ही नहीं तो मिलता कैसे…? बस यहीं से उसके दुख शुरू हो गए। महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है ही नहीं, मतलब उसके लिए तो दोहरा नर्क है… एक जो धार्मिक कथाओं में है और दूसरा ‘पृथ्वीलोक’… ‘मृत्युलोक’…। तो नर्क में तो कोई अंतर नहीं है, हाँ अघोषित रूप से स्वर्ग तो सिर्फ पुरुषों के लिए ही है…। तो आजकल वो लगी है, स्त्रियों के लिए स्वर्ग का ‘कंसेप्ट’ बनाने में… आइए जरा उसकी मदद कीजिए श्री शाही जी की प्रेरणा ज्यादा बेहतर लगती है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मेरे विचार से स्त्री के स्वर्ग के लिये कंसेप्ट पश्चिम से आयात कर लेना मुफ़ीद रहेगा । क्योंकि जहाँ के स्वर्ग को सिर्फ़ पुरुषों की सुविधानुसार गढ़ा गया हो, उस देश के थिंक टैंक में इतने बड़े-बड़े आइडियाज क्या खाक़ पैदा होंगे ? इतने महान आइडियाज वहीं से खरीदे जा सकते हैं, जहाँ की महिलाएँ प्रकृति द्वारा अबला बनाए जाने के बावज़ूद सबला हैं । जिन्हें दूर-दूर तक, विदेशों तक की यात्रा अकेले करते हुए घूम आने में कोई डर नहीं लगता । देर रात धरती के किसी कोने या बीच पर घूमते हुए यदि उनके साथ कुछ अघटित भी हो जाय, तो उनकी बला से । पहले निर्लिप्त भाव से तूफ़ान को शांत होने देंगी, फ़िर सोचेंगी कि आगे किसी और कार्रवाई का मूड है या नहीं । यदि भारतीय स्त्री भी इतनी जल्दी इस स्तर की डेयरडेविल बन सके, तो उसे अवश्य अब अपने लिये स्वर्ग का निर्माण कर ही लेना चाहिये । लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी स्थितियाँ पूरी तरह निर्मित हो पाने में अभी कुछ विलम्ब है । योजनाएँ पाइपलाइन में हैं, प्रक्रिया अन्डर प्रोसेस है, परन्तु अभी भी सबकुछ कच्चा-कच्चा सा है । अभी भी तमाम ऊँची उड़ानों के बावज़ूद भारतीय स्त्री अकेले कहीं दूर जाने से डरती है । तारिका है तो आउटडोर शूटिंग पर मम्मी-पापा को साथ लिये बिना नहीं जाना चाहती । नई सर्विस ज्वाइन करने के लिये भी उसे पैरेंट्स का साथ चाहिये । देर रात सिनेमा देखना है, तो कम से कम अंतरंग ब्वायफ़्रेंड चाहिये । पूरी तरह सेल्फ़ डिपेंडेन्ट हुए बिना अकेले स्वर्ग में भी कैसे रहेगी ?

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: amita neerav amita neerav

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आदरणीया अमिता जी, आज वसंत पंचमी के दिन सुबह-सुबह पत्नी ने इशारा करते हुए कहा, " वो देखिए वो, आम में बौर..." और सुबह ही आम का बौरायापन दिख गया | और साँझ होते-होते जब जेजे का पट खोला तो आप के मन के वासंती फुहारों से सराबोर हो उठा हूँ | क्या खूब लिखा है आप ने-- "धूप के पीले, सुबह के सिंदूरी, आसमान के रंग-बिरंगी होने और शामों के सुरमई होने के दिन… मन के मयूर हो जाने और प्रेम में डूब जाने का मौका है वसंत। जिस तरह प्रेम विस्तार है भावनाओं का, उसी तरह वसंत विस्तार है जीवन के आनंद का।" xxx "हवाओं की नशीली गंध, बौराया आम और महुआ के फूलों की महक से होश खोते मन की ऋतु है वसंत।" लहर-से बल खाते अभिव्यंजित विचारों वाले साफ़-सुथरे, स्वस्थ-सुन्दर आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! 'बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक ' के लिए हृदयपूर्वक बधाई !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

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के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

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अमिता जी सादर नमस्कार, किताबों में दबे एक सूखे गुलाब की खुशबु तनमन को महका देती है जो ताजा हजारों गुलाब भी शायद ना कर पायें. फिर पिछले छूटे निशानों की तो बात ही क्या है."बेखयाली में जंजीर को छोड़कर चौथी सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाया ही था कि खयाल लौट आया" अब लौट आया या माँ गंगा के शीतल जल की लहरों ने भान करा दिया,आस्था की शक्ति दिखा दी या प्रवाहित दीपों के कचरे को तो समाहित करने में उसे कोई परहेज नहीं किन्तु इंसान की लाश कहाँ तक ढोए. चलो अंत भला तो सब भला, सुखद यात्रा, जीवन के अनमोल पलों को फिर सजीव होने का अवसर मिला. कहते भी हैं की यदि उदासी हो तो जीवन के अनमोल खुशियों के पलों को याद करों उदासी छंट जाती है. बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: amita neerav amita neerav

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अमिता जी सादर, आपने बहुत ही अच्छे से अपने अतीत को याद किया है, मुझे नहीं लगता की तब के हालात और आज के हालत को कोई बहुत अंतर आया है हाँ कुछ बदलाव तो समय के साथ जरूर ही हो गए हैं.औसत आय वालों की कमोवेश वही स्थिति है. तब घर में बिजली की बचत के लिए स्ट्रीट लाइट के नीचे दरी बिछाकर पढ़ते थे आज बिजली कटौती के कारण बैठते हैं. तब सिंहस्थ में पानी की किल्लत से जूझना पडा था अब जब पानी की किल्लत होती है सिंहस्थ हो जाता है. सुविधा को सुख से और संघर्ष को दुःख से जोड़ना मुझे तो नहीं लगता की वाकई ऐसा है. क्या वाकई सुविधाएं सुख देती हैं? मुझे नहीं लगता. क्योंकि जब मै सायकिल चलाता था सुखी था क्योंकि सारा शहर सायकिल चलाता था किन्तु जब मै स्कूटर चलाता हूँ तो दुखी होता हूँ क्योंकि शहर में हर दिन नवीनतम माडल की मोटरसायकिल देखता हूँ. संघर्ष सुख में भी है और दुःख में भी, क्योंकि जीवन संघर्ष ही है.इसे पूरी तरह सुविधा और दुविधा से नहीं जोड़ा जा सकता.

के द्वारा: akraktale akraktale

और हमारा बचपन…. पानी-बिजली की इफरात, कपड़ों की कोई कमी नहीं। फीस की चिंता क्या होती है, पता नहीं। पढ़ने के लिए किताबें तो ठीक, ट्यूशन टीचर तक की व्यवस्था थी (चाहे लक्ष्य किसी की मदद करना रहा हो)। स्कूल सारे पाँच सौ कदमों से लेकर आठ सौ कदम के फासले पर हुआ करते थे। च्च… कोई संघर्ष, कोई अभाव, कोई असुविधा नहीं। कॉलेज तक यही स्थिति बनी रही। हाँ यूनिवर्सिटी जरूर घर से ९-१० किमी दूर थी। शुरुआत में टेम्पो से ही आया-जाया करते थे… याद आता है लौटते हुए अक्सर दोस्तों के साथ ठिलवई करते हुए आधे से ज्यादा रास्ता पैदल ही तय किया जाता था, जब तक कि ज्यादातर दोस्तों के घर आ जाया करते थे, तो क्या वो संघर्ष था!....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: abhii abhii

अमिता जी सादर नमस्कार, आज तो विषय समाज उस वर्ग का है जो अपनी ही बेटियों के जीवन की नोट बुक के प्रथम प्रष्ट पर मौत लिख दे रहे हैं. आपकी काव्य श्रेणी की प्रथम रचना पढ़ रहा हूँ. बहुत सुन्दरता से आपने जीवन के इस सफे पर लिखा है. मुझे एक कहानी स्मरण हो आयी. एक पिता अपने तीन बच्चों की बुद्धि परखने के लिए तीनो को कुछ रुपये देता है और कहता है की तीनो को इन रुपयों से अपना अपना कमरा भरना है.तब एक अपने कमरे को रुपये कम होने के कारण कचरे से भर देता है दूसरा रद्दी से भर देता है और तीसरा कुछ अगरबत्तियां जलाकर खुशबु से भर देता है और बचे रुपये पिता को लौटा देता है. बस सारी सावधानी भरते समय ही रखनी है. ताकि फिर मलाल न रह जाए.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

सादर, अवश्य ही अतार्किक लगता होगा आपको, अपने आपको सर्वश्रेष्ठ जो मानता है मानव. प्रथ्वी को रहने काबिल बनाया, किसके रहने काबिल सिर्फ खुद के ही ना अन्य प्रजातियों का क्या? और अपनी बुद्धि के दम पर उनके घरौंदे नहीं हैं? क्या कभी आपने किसी चिड़िया को घोंसला बनाते देखा है शायद मानव भी वो काम ना कर सके. मानव का कोई काम प्रकृति के हित में है नहीं ना तो मानव ने प्रकृति प्रदत्त जंगलों से अधिक जंगल बनाए ना ही मानव ने नयी नदियाँ बनायी बल्कि इन सबका विनाश कर आज जब खुद का विनाश सामने दिखने लगा है तो हाय तौबा करने में मानव ही सबसे आगे है. किसी अन्य जीव को मैंने चिंतित नहीं देखा. और ये शास्त्र हैं किसके मानव के ही ना, मानव ने ही इनका निर्माण किया है फिर तारीफ़ किसकी होगी उसमे? अवश्य ही मानव की ये शास्त्र क्यों कहेंगे की मानव को शेर का जन्म लेना चाहिए. मानव ने जो भी निर्माण किया है अपने स्वार्थवश किया है उसका कोई लाभ इस धरती पर रह रहे अन्य प्राणियों के लिए नहीं है ना ही प्रकृति के लिए है. अब इसे ही क्या हम सर्वाधिक बुद्धिमान कहें?

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अमिता जी सादर नमस्कार, " तो हुआ ना इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति…" किसने कहा? मैंने तो कभी किसी जानवर के मुह से भी नहीं सूना ! अपने मुंह मियाँ मिट्ठू.कौन है जिसे इश्वर ने कमतर बनाया है. किसी भी पक्षी से पूछोगे तो वह यही कहेगा की वह सर्व श्रेष्ट है.किसी जानवर को भी यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा. हाँ जो जानवर या पक्षी मनुष्य की कैद में हैं वे जरूर कहते होंगे की बड़ा जालिम बनाया है खुदा ने इंसान को.और रही बुद्धि की बात तो मासूम गिलहरी ने सिद्ध कर ही दिया है की बुद्धि पर सिर्फ मानव का कब्जा नहीं है सब का हक़ है इस पर. हाँ मानव ने इसका उपयोग अधिक किया है उसी के कारण आज दुनिया में इंसान उसके नाम से, उसके धर्म से, उसके रंग से,उसकी हैसियत से पहचाना जाता है.

के द्वारा: akraktale akraktale

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आदरणीय अमिता जी .....सादर अभिवादन ! आपका यह लेख पढ़ने के बाद उस रजा की बात याद हो आई जिसने की पार्टी में ही आमिर महिलाओं को देखने के बाद उनके व्यवसायी पतियो पर भारीभरकम टेक्स लगा दिए थे ...... ऐसे लोगों की पार्टियों में इनकम टेक्स वाले आ जाए तो यह अपने असली गहनों को भी नकली बताए (गिफ्ट फ्राम राजकमल ) हा हा हा हा हा हा हा हा हा सुन्दर रचना पर मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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अमिता जी नमस्कार, बहुत दिनों बाद आपका कोई आलेख आया है. मुझे संक्रांति पर उम्मीद थी की आप अवश्य लिखेंगी.खैर, मैंने आलेख कल ही पढ़ लिया था और सोचा था प्रतिक्रया नहीं लिखूंगा फिर आज सोचा ठीक है कुछ बुरा अवश्य लगेगा किन्तु लिख ही दूँ. क्योंकि ये आलेख आपकी ख्याति के अनुरूप नहीं है. कई जगह उबाऊ भी हो जाता है.किन्तु ये कहूँ की पूरी तरह नीरस तो ऐसा भी नहीं है. कुछ ऐसा भी है जो अपनी छाप छोड़ता है.अभिव्यक्ति महसूस हो रही है किन्तु सटीकता की कमी है. मुझे किसी शायर के गीत की पंक्तिया याद आ रही है शेयर कर रहा हूँ. "सोचा था मय है जिंदगी, और जिंदगी की मय प्याला हटा के, तेरी हथेली से पियेंगे, वो ख्वाहिशे अजीब थी सपने अजीब थे".

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय अमीता जी ..... सादर अभिवादन ! आज फिर आपके ब्लॉग का पुराना मर्ज उभर आया है कमेन्ट के कोड के शुरूआती अक्षरों को अपनी कालिमा में समाने वाला – हा हा हा हा हा हा आपकी यह रचना अंत तक बंधे रखती है सम्मोहन करती हुई सो लगती है गहरे उतरती हुई अपनी छाप छोड़ती हुई एह्सास जगाती हुई चैटिंग रूम में उस लड़की ने जब मुझसे अधिकारपूर्वक कहा था की “तुमने अपनी अपनी दी क्यों बदल दी – तब समझ में नहीं आया था की उसने अपनेपन से कहा या फिर गुस्से से या फिर अधिकार से”- सच में कभी कभी शासित होना अच्छा लगता है – बच्चे की तरह से बात मानना अच्छा लगता है ..... इस सुन्दर रचना पर ढ़ेरो मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

राज जी इस मामले में हमें थोड़ा यथार्थवादी होने की जरूरत है। अमेरिका तो वो करता है जो उसे सूट करता है। मुश्किल ये है कि वो हर चीज में हमारा रोल मॉडल हो चुका है। हमारे नीति नियंताओं ने (हाँ ये ग्लोबलाइजेशन की मजबूरी है) कभी ये जानने की कोशिश नहीं की है कि हमारी जलवायु, व्यवस्था, जनसंख्या, आकार, विचार और संस्कृति को देखते हुए क्या ज्यादा उपयुक्त रहेगा। शायद ये सारी दुनिया का सच है। हरेक बस भेड़चाल का शिकार हो रहा है, बने-बनाए रास्ते पर चल रहे हैं, किसी ने भी अपना रास्ता बनाने की कोशिश नहीं की। असफलता ये नहीं है कि हमने क्या विकास किया, असफलता ये है कि हमने अपने लिए क्या ईजाद किया, विचार के तौर पर, व्यवस्था के तौर पर और भौतिक आविष्कारों के तौर पर भी...। हमने पहले भी चीजों को मैनेज करने में मदद की, आज भी कर रहे हैं, कभी 'निर्माता' नहीं हो पाए...। नए साल की शुभकामना के साथ शुक्रिया भी... :-)

के द्वारा: amita neerav amita neerav

अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश जो मानव अधिकारों और तरह तरह के समानता अधिकार के ढेकेदार की तरह अपने को पेश करते हैं | दरअसल वे एकतरफा नियमों कानूनों के हामी हैं | वे अपने यहाँ से अस्वीकृत सब कुछ अन्य देशों पर जबरिया थोपने का माद्दा रखते है | ये जंगलों से निकल कर सीधे आततायी बने और सारे विश्व में जहाँ भी अशोंतोष है वह वस्तुतय इन लोगों द्वारा ही इम्प्लांट किया गया है | उनका अपना घमंड व अपने श्रेष्ठ नस्ल का समझना और इस दबदबे को बनाये रखना उनके लिए जरुरी है | कभी हम आप जैसे बहुत से लोग उदारीकरण और मुक्त व्यापार तथा सहकारिता को छोड़कर कोर्परेट की चकाचोंध को बेहतर समझते रहे पर आपने सही कहा कि सारे फायदे एक % वर्ग द्वारा छीन लिया गया | बाकई अच्छा लेख |

के द्वारा: RaJ RaJ

के द्वारा: amita neerav amita neerav

के द्वारा: amita neerav amita neerav

अमिता जी नमस्कार, आप एक तीर से दो शिकार करने निकली थीं तो फिर पछताने के तो पुरे चांस थे, नियति ने अपना काम किया. मुझे मधुशाला की एक पंक्ति याद आ रही है "राह पकड तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला..." मगर आप तो कहती हैं आप को कुछ पाना ही नहीं है,पाना तो रुकावट है. यदि आपके अनुसार संसार चलता तो इसका प्रवाह ही रुक जाता, यदि हम लक्ष्य को रुकावट मानते हैं तो बच्चे को माँ के पेट में ही पालना चाहिए,उसका जन्म तो रुकावट है.संसार के बड़े बड़े निर्माण लक्ष्य साध कर किये गए हैं.लक्ष्य साधना का प्रतिफल है रुकावट नहीं.यदि ओशो ने यह कहा है की बैठो कहीं जाना नहीं तो सिर्फ आपके जैसे लक्ष्यविहीन लोगों के लिए ही कहा है. ओशो ने ठीक ही कहा है जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है.बिलकुल सही है.क्योंकि जीवन का लक्ष्य हमें निर्धारित करना है. अंत में आपने लिखा है कला जीवन के लिए है या जीवन कला के लिए…? ये तो लगभग वैसी ही बात हुई की सूरज डूबता है दिन ख़त्म करने के लिए ये रात के आने के लिए.साफ़ है दोनों पूरक हैं.आपकी सुन्दर लेखन शैली मोहित करती है.साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

मुझे नहीं मालुम की इंसान के जेहन में नकारात्मक विचार कहाँ से आते हैं.जब किशोर और मुकेश के गीत बज रहे हों तो लोग क्यों मुकेश को सुनते हैं.जैसे आपने कहा सुबह से अखबार में नकारात्मक खबरें होती हैं.मेरे अखबार में तो सभी सकारात्मक ख़बरें ही आती हैं.हर दिन भविष्यफल में लिखा होता है आज का दिन शुभ है क्योंकि आज फिर सूरज पूरब से उगा है.अखबार में विज्ञापन पढ़कर लगता है की अब तो कॉफ़ी पिने की आवश्यता ही नहीं है.जब किसी टाउनशिप में मकान की कीमत पढता हूँ तो लगता है अब तक लाखों के मकान में रह रहे थे आज से करोड़ों के मकान में रहेंगे.वैसे ही जब टीवी, फ्रिज या वाशिंग मशीन के विज्ञापन पर नजर जाती है और उसमे कही एक वर्ष और कहीं छः महीने की वारंटी देखता हूँ तो सीना गर्व से फूल जाता है की ये सभी चीजें मेरे पास आज दस वर्षों से बिना गारंटी के भी कोई शिकायत नहीं कर रही. टीवी पर जब विज्ञापन आते हैं तब तो मै चेनल बदलने में ही व्यस्त रहता हूँ तो उनका प्रश्न ही नहीं उठता. हाँ,फिरभी कहता हूँ बाजार है विज्ञापन है असर तो करते ही हैं किन्तु विचलित नहीं करते. वरना तो किराने वाला हर दिन नए साबुन से नहाता हर दिन नया पेस्ट उपयोग में लाता और इलेक्ट्रोनिक्स शॉप वाला हर दिन अपने घर में टीवी बदल देता.किन्तु ऐसा होता नहीं है. और भी गम है जमाने में एक तेरे गम के सिवा.

के द्वारा: akraktale akraktale

मीनूजी इस उपभोक्ता और बाजारवादी संस्कृति ने जितना मानवता का नुकसान किया है, उतना अब तक सिर्फ धर्म और राजनीति ने ही किया है। ये एक मान्य सत्य है कि संतोष ही जीवन का धन है औऱ ये बाजार इसी धन को सबसे पहले लूटता है। जैसा कि गाँधी जी ने कहा था कि - प्रकृति के पास हर इंसान की जरूरत पूरा करने की कूव्वत है, लेकिन वह एक भी इंसान की हवस को पूरा नहीं कर सकती है। तो बाजार सिर्फ हवस पैदा करता है, सपने दिखाता है और हमें अशांत औऱ असंतुष्ट रहने के लिए छोड़ देता है। और आप मुझे ये कहने के लिए माफ करेंगी कि प्रबंधन ने इंसान की सृजनशीलता को नष्ट कर दिया है। अब सिर्फ मैनेजमेंट ही मैनेजमेंट होता है, प्रोडक्शन के बारे में कोई नहीं सोचता...। मैं भी राजनीति विज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ, इसीलिए आज मुझे सबसे ज्यादा कोफ्त राजनीति से ही होती है। तो जरा कंफर्ट कोर्ट बदल कर देखिए विचारों में भी बदलाव मिलेगा... :-D टिप्पणी के लिए शुक्रिया...

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भटकना और रम जाना दोनों देखने एक जैसी हरकते है , दोडते रहना केवल इसलिए कि दुसरे से आगे निकलना है i या खुद की मंजिल पानी इसलिए, बड़ा फरक है | ओशो निश्चित ही उन लोगों के निरर्थक भागने से मायना निकाल रहे थे जो भाग भी रहें है थक भी रहें है , जो उन क्रियाओं का मजा नहीं ले रहे , जीवन को जी रहे है जैसे किसी पर अहसान कर रहे हैं | सुख कहीं नहीं है और हर जगह है , जैसे हरी कहीं नहीं और हर जगह है | कहाँ दिक्कत है कहाँ उलझन है | दिक्कत भी वहीँ है उलझन भी वहीँ जब कोई अपने लिए जीने लग जाये जाए | दुसरे के लिए जी जाये तो उलझन अभी मिट जाए ये | पर ये दूसरा है कौन ये दूसरा है एक नशा , किसी का भी हो| बस अपना न हो अपने लिए नाम, इज्जत , दिखावे क न हो | समर्पण हो जाये पूरा समर्पण | कोई उद्देश्य के लिए , ध्येय के लिए , देखो दीवानगी आ जाये|मानो जीवन में लिखते ही रहना है | अभी एक दीवाना बिहार में ५६ हज़ार रचनाये लिखकर अपना आखिरी ख़त होस्पिटल के बिस्तर से लिखकर दुनिया से चला गया | कह गया उसका सब घर बार सरकार लेकर घर को पुस्कालय बनवा दे लोग उसके जाने बाद उसे पढ़ें | अभी जिक्र आया एक और दीवाने का| एक प्लास्टिक सर्जन का अमेरिका में ६ माह रहकर कमाता बाकि ६ माह भारत में रहता और केवल ४-६ घंटा सोता और लगभग बिना कुछ लिए दिन दिन भर शल्य चिकित्सा से कटे फटे होठों को इतनी जल्दी सीं देता कि सिखने वाले विद्यार्थी उसकी शल्य चिकित्सा का विडिओ बनाते और कम गति में देखते \ इतने लोगों के मुस्कारते चेहरे शायद उसे किसी उदीश्य के बारे सोचने का समय देते | sa पूरी तरह डूब जाओ जो क्रिया शारीर कर रहा वो कभी भागम भाग है या बिलकुल शांत और जगह से बिना हिलने वाली दोंनो में सुखी वही जो अपने को आत्मसात कर पता है इनसे | हर घडी अन्सुन्धन में लगा वैज्ञानिक अगर खो गया है अनुसन्धान कि दुनिया कि खबर नहीं तो वो वही सब पा लेगा जिसे शायद मोक्ष कहते हैं और कोई भी तपस्या करता और लगातार इस बात को मन रखता कि क्या मोक्ष मिलेगा सोचने वाला सन्यासी शायद भटक ही रहा है \ खो जाना ही सही अर्थों अपने पा लेना है | फिर किसी के प्यार में खो जाना जहाँ अपनी खबर न रहे किसी मोक्ष कम नहीं | आपको पढने के बाद लिखने से रोकना मुश्किल रहता अतः कई बार बाई पास ही कर देता हूँ \ बधाई अमिता नीरव जी

के द्वारा: RaJ RaJ

अमिता जी नमस्कार, अदिति ने आपको सलाह दी मेडिटेशन की यदि हमसे मुखातिब होती तो हमें भी जरूर देती यही सलाह.क्योंकि पूरा आलेख सिर्फ बैचेनी ही है और अवश्य ही हमें भी पढने के बाद मेडिटेशन की जरुरत है.कल ही मै किसी सहकर्मी को बैचेनी पर उपदेश देकर आया हूँक्योंकि उसकी भी स्थिति कुछ ऐसी ही है काम को मन से करने के बजाय दिल से लगा लेता है फिर बैचेन हो उठता है.काम के समय काम करो और बाद में भूल जाओ और कुछ आनंद के पलों को जियो. कल उसने भी एक किस्सा सुनाया आपके साथ शेयर कर रहा हूँ. एक व्यक्ति अपनी समस्या लिए अपने गुरूजी के पास जाता है गुरूजी उसे एक पेड़ का पता देता है और कहते हैं की अपनी समस्याओं की एक गठरी बनाओ और उस पेड़ पर टांग दो तुम्हारी समस्याएँ दूर हो जायेंगी. दुसरे दिन वह यही करता है किन्तु पेड़ के सामने जाने पर देखता है वहां तो बड़े बड़े गट्ठर लटके हुए हैं.वह समझ जाता है की मेरी समस्याएँ इनके सामने कुछ भी नहीं और वह प्रसन्न मन से लौट आता है.

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अमिता जी नमस्कार, आपने एक संयुक्त परिवार की रोजमर्रा की जिन्दगी में परिवार की महिला सदस्यों के योगदान की साधारण सी बात को अपने आलेख में प्रस्तुत किया है ये तो आपके लेखन शैली का प्रवाह है की इसकी निरंतरता अंत तक बनी रही. माँ, बा या एक रसायन.. सभी बातें मातृत्व से जुडी हैं. अक्सर या सामान्यतौर पर महिलाओं को माँ या बहन के नाम से संबोधित किया जाता है क्यों? क्यों की यह गुण उनमे जन्म से ही मौजूद होते हैं. प्रक्रति ने उन्हें ऐसा ही रचा है. आपने शायाद वो जूमला सूना ही होगा की मूल से सूद प्यारा होता है और आप भी बा के लिए सूद की तरह ही थीं उस घर में. प्रतिक्रया में मैंने देखा की टिम्सी जी काली कहने वाली बात पर काफी नाराज नजर आयीं, शायद उनको उसमे आप की बुआ की शरारत नहीं दिखी.क्योंकि जिस प्रसंग में ये कहा गया है वो बा के प्रेम पर चुटकी लेने के लिए है. किसी को जलील करने के लिए नहीं है.

के द्वारा: akraktale akraktale

आपके लिए ये कहना, कि सुन्दर रचना, तो केवल एक औपचारिकता होगी..! आप जानती ही हैं..! :) जहां तक मातृत्व की बात है, तो मुझे एक गहरा विचार याद आ रहा है, कि मातृत्व कोई सिर्फ अपने छोटे परिवार में बाँटा जाने वाला संकुचित भाव नहीं है. ये तो एक वैश्विक, सार्वभौमिक अधिकार है, जो कभी किसी वर्तुल में सिमट ही नहीं सकता. एक माँ यदि अपने पुत्र से तो स्नेह करती है, पर दुसरे किसी बच्चे के प्रति कड़वा भाव रखती है, तो समझने की ज़रूरत है, कि वो मातृत्व या स्नेह था ही नहीं, वो तो मोह-मात्र है. बिलकुल वैसा ही भेद, जैसे नदी के निर्मल जल, और नाले का गन्दला पानी.. खेद इस बात का है, कि हम सब संकीर्ण हो चुके हैं. पवित्र भाव के विषय में सुनते भी हैं, सुनाते भी हैं, पर तोते की तरह. आप सौभाग्यशाली हैं, जो आपने इसे न केवल देखा, वरन चखा..! :) आगे मुझे ये कहना है, कि जो आपने काले रंग को लेकर कहा, तो वो भी एक कालिख है, हमारे समाज पर. बताइए, क्या काला रंग किसी को अछूत बना देता है? तन काला हो, तो हज़ार फब्तियाँ. पर अगर किसी का मन ही काला हो तो कोई समस्या नहीं.. ! रूप-रंग तो कितनी गौण बातें हैं. जो व्यक्ति इन बातों के आधार पर किसी के मन को दुखाये, उसे ही दरअसल ताने दिए जाने चाहिए. 'छोटी मानसिकता'. ये भी तो देखें, कि ऐसा करते हुए हम केवल ईश्वर की रचना को कोस रहे हैं, और वो भी, केवल अपना अहं पुष्ट करने के लिए. क्षुद्रता की पहचान आचरण से होती है, त्वचा के वर्ण से नहीं..!

के द्वारा: Timsy Mehta Timsy Mehta

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तभी एक स्थानीय युवक ने पूछा – आपका फोटो ले सकता हूँ? क्यों नहीं, लेकिन एक शर्त है, आपको भी हमारे फोटो खींचने पड़ेंगे। जरूर… आदरणीय अमिता जी ....सादर अभिवादन ! आजकी इस कड़ी में आपका पुराने वाला "मैजिक टच" फिर से दिखा है जोकि पिछली बार नदारद था ..... अब मैं कह सकता हूँ की यह लेख किसी भी चित्र का मोहताज नहीं है ..... आपकी उपर वाली लाइनों की जरा विस्तार से स्पष्ट करने की किरपा करे तो मेहरबानी होगी ?..... आपका मुबार्कबाद सहित आभार मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अध्यात्म क्या है, क्या एक और धर्म | धर्म संसार भर फैला हुआ जंजाल है कहीं का प्राणी बचा नहीं है इससे | मनुष्य की कुछ जरुँरतें मुलभुत जैसे भूख और सेक्स प्राणिमात्र एक सामान मौजूद है | मनुष्य प्राणी ओं में सबसे अधिक विकसित है इसकी जरूरतें ऊपर बताई जरुरत पूरी होते ही मुखर होने लगती हैं | अपने को सुखी और परम आनंद की स्थति पाने का "जीनोम " हर जीवन में जन्म से प्रदत्त है | हरेक की अपनी खोज अपना तजुर्बा है | खुद को समपर्ण करके किसी भी मुर्खता से मुर्खता भरा काम करके जसमें साधू मौल्विओं महात्माओं के हवाले खुद को करके बहुत लोग खुश हैं , इन सबसे आप और में शायद तिलमिला जाएँ कि आँखें बंद कर कैसे झूठे मक्कारों के आस पास कोई खजाने कोई संतान कि चाह में इतने लोग क्यों हैं | पर वह व्यक्ति भी देखा जाये तो अपने भटका ही रहा है और भटकना ही अध्यात्म है | धर्म भी भटकता है मूल उद्देश्य तक पहुँचने नहीं देता, कोई नई सोच यहाँ जन्म नहीं लेती | घर से बहार दूर दूर कभी ऊँचे पहाड़ों, कभी खंडहरों में विश्राम और आराम कि खोज के साथ ही घर कि और दुबारा रुख करके फिर नया अनुभव (कुछ थक गए तो लगा घर ही अच्छा } केवल भटकने की सुचना है | भूख , प्यास , सेक्स की आधार भुत जरुरत पूरी होने के  बाद सब कुछ भटकना है जो पूरी तरह भटक गए वो ययावर महावीर , बुद्ध , यहाँ तक कि चीनी यात्री भी जो पता नहीं कितने वर्षों भारत में घुमे कि आज जो इतिहास हमें अपने देश का पता है वो उनका लिखा है | हम भी भटकते है पर कितनी देर को फिर घर लौट आते हैं अपनी जिंदगी सिमट जात्ते हैं | क्यों नहीं भटकते मदर टेरेसा कि तरह जब अपना एहसास ही ख़त्म हो जाता हैं | कहीं ऐसा रम जाना जहाँ अपनी खबर न हो , पर shart है हमेशा ke liye varna कुछ samay ke liye तो shrab pikar भी वो हासिल कर सकता है | मैं ज्यादा न भटक पाऊंगा कि सुबह जल्द उठाना है फिर वाही सब , देखो अभी में बैठे बैठे भटक गया और बापिस घर आ गया उन प्यारी चिंताओं साथ जिनसे मैं अलग नहीं हो सकता | रचना वाही जो दुसरे से लिखवा ले आप सफल रही मैंने भी मनकी भटकन निकल ली बधाई अमिता जी , हमेशा कि तरह कमेन्ट औपचारिकता वश न दें हाँ कुछ विवशता हो तो जरुर लिखें राजीव "राज"

के द्वारा: RaJ RaJ

http://amitadixit.jagranjunction.com/2011/11/07/आशा-निराशा-के-बीच-मनाली/ आदरणीय अमिता जी ....सादर अभिवादन ! जिस तरह से आपके पास समय की कमी है वैसी कमी बाकि लोगों के पास तो नहीं है लेकिन फिर भी इतना खुला और ज्यादा समय भी नहीं है की मनाली की सैर की थकान के बाद अब फेसबुक की सैर भी कर सके ..... हां हां हां हां हां हा हा वैसे मेरा मानना है की इसप्रकार के लेखों के साथ जब तलक चित्र नहीं होंगे पाठक लेख से पूरा जुड़ाव महसूस कर ही नहीं सकेगा ..... फिर भी मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/05/“भ्राता-राजकमल-की-शादी”/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय अमिता जी .....सादर अभिवादन ! पता नहीं यह सच है या फिर कोई कोरी गप्प ! बचपन से सुनते आये है की एक बार अंग्रेजो ने आपकी तरह आत्मा का वजूद जानने के लिए एक शीशे के कमरे में मरणासन्न प्राणी को बंद कर उसको एयर टाईट कर दिया .... कुछ देर के बाद ही उस शीशे के घर में एक छोटा सा धमाका रूपी छेद हुआ और आत्मा अपना वजूद जतला कर +बतला कर अपने धाम को चली गई ..... मुझको पता चला है की अपने किसी पिछले जन्म में आप भी उस समय वहीँ पर थी ..... अगर मेडिटेशन + हिप्नोटिज्म की मदद से याद करेंगी तो शायद याद आ जाए और फिर आप भी कहेंगी की सुनो ब्लागरो ! आत्मा नाम की कोई चीज भी होती है ! (उल जलूल विचार ) मुबार्कबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: amitadixit amitadixit

के द्वारा: amitadixit amitadixit

अमिता जी पहले तो आपको ब्लोगर ऑफ़ दी वीक बनने की बहुत बहुत बधाई हो ..... क्या जीवन की कोई मंजिल है? मान ही लें कि जीवन की मंजिल मौत है… सवाल खत्म… विचार भी खत्म…। जीवन की मंजिल हैं उसके खूबसूरत कर्म ... कर्म किये जा मंजिल अपने आप मिल जाएगी ... फिर मौत जो एक दिन आनी ही होती है वो खूबसूरत लगेगी ... शारीर तो चला जायेगा मिटटी से बना था उसी में मिल जायेगा लेकिन किये गए कार्य हमेशा बने रहेंगे ... कोई भी जब चला जाता है तो सब भूल जाते हैं कुछ दिन बाद लेकिन अगर कुछ अछे कार्य किये हो तो थोडा समय और विचारो में जिन्दा रह लेते हैं ... कुछ भी अपना नहीं है अपना शारीर भी नहीं क्यूंकि ये भी एक दिन छोड़ के चला जाता है .....

के द्वारा: mparveen mparveen

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सबकुछ कर के तो देख चुका अमिता जी ! वह भी, जो शायद नहीं करना चाहिये । उसके बाद ही दलील दे रहा हूं । ईश्वर के होने का विचार ही तो ईश्वर है, वरना किसने देखा उसे आजतक ? दिल को कभीकभार दिमाग से स्वतंत्र रखने की व्यवस्था भी उसी की दी हुई है, वरना हम खुद को रीक्रियेट करने में अक्षम होते । अनुशासन भी उसीने बनाया हुआ है । यह कल्पना से परे है कि ब्रह्मांड के करोड़ों सूर्य, चांद, तारे और ग्रह-नक्षत्र यदि एक पल को भी अपना अनुशासन भंग कर चुम्बकीय आलम्बन से परे सरक जायं, तो फ़िर क्या होगा ? क्या हम तर्क़ करने के लिये वज़ूद में रह पाएंगे ? हमारी अपनी शारीरिक संरचना का, तंत्रिकातंत्र और अंगों के आपसी सामंजस्य का शत-प्रतिशत खुलासा तक कर पाने में विज्ञान आजतक असफ़ल है, मस्तिष्क की जटिल संरचना की तो बात ही छोड़ दीजिये । खानपान में हल्की अनुशासनहीनता हमें कितनी भारी पड़ जाती है ? हमने रोबोट बनाए, कम्प्यूटर बनाए, विमान उड़ाया, परन्तु क्या कुछ भी मौलिक है ? जी नहीं, उसकी रचनाओं की नक़ल करने से अधिक हमारी अकल आज तक नहीं दौड़ पाई । रोबोट और कम्प्यूटर में मानवीय रचना की नकल, हवाई जहाज और उपग्रह उड़ाने में परिन्दों की रचना की नकल, हमारे अपने दिमाग की उपज भला है क्या ? खुद को तो आजतक समझ नहीं पाए, और विज्ञान, जो स्वयं महाज्ञान का पिंड मात्र है, उसकी थोड़ी सी उपलब्धियों पर इतना इतराते हैं, कि उसकी सत्ता पर ही बार-बार संदेह करने की ज़ुर्रत करते रहते हैं । स्पेस में पहुंचे भी तो इसी कारण, क्योंकि उसका बनाया शून्य वज़ूद में है । अनास्था से उत्पन्न आनन्द एक भ्रम है, मृगमरीचिका है । आस्था और प्रेम एकदूसरे के पर्याय हैं । प्रेम को ईश्वर ने अनुशासन तोड़ने की जितनी आज़ादी बख्शी है, भ्रमवश हम उसे ही अपनी भाषा में अनुशासन भंग करना मान लेते हैं, जो एक संकुचित दृष्टिकोण है । ईश्वर ने प्रेम को आज़ादी दी भाव में अतिरेक पैदा कर चरमानन्द की प्राप्ति के लिये । भक्तिभाव का, मानव का ईश्वर के साथ, मानव का मानव के साथ संबन्धों का चरमानन्द प्राप्त करने के लिये । यह महज़ ईश्वर प्रदत्त आज़ादी है, अनुशासनहीनता नहीं । शेष वास्तविक अनुशासनिक ढांचे को तोड़ने का प्रयास उसने जानबूझ कर कष्टदायक बनाया, ताक़ि हम प्राकृतिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ न कर सकें । सुई घोंपने से ब्लीडिंग होगी, घाव बनेगा, जो प्राणघातक हो सकता है, इसलिये चुभते ही दर्द के एहसास का सृजन किया, ताक़ि हम सावधान हो जायं । बड़ा गूढ़ विषय है अमिता जी, हमारी पहुंच से बहुत परे । धन्यवाद !

के द्वारा: आर. एन. शाही आर. एन. शाही

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विचारणीय मंथन, बधाई ! परन्तु यदि आनन्द ही सचमुच जीवन का अभीष्ट है, तो इस परम सत्य को भी स्वीकार करना ही होगा कि, जहां आस्था है, वहीं आनन्द है, और आनन्द के अभाव में सब कुछ शून्य है । रुदन का भी अपना एक आनन्द है, इसे वे कभी नहीं समझ पाते, जिनकी आंखें किसी भी परिस्थिति में, चाह कर भी, प्रयासपूर्वक भी, गीली तक नहीं हो पातीं । भौतिकता या समृद्धि का आनन्द से कोई सरोकार नहीं होता, न ही आस्था अथवा अनास्था से । यह भ्रम मात्र है, कि बारबालाओं के साथ मदमस्त होकर पानी की तरह पैसा बहाकर नाचते नवकुबेर आनन्द के सागर में गोते लगा रहे होते हैं । यदि शराब या ड्रग के प्रभाव में न हों, तो पैर थिरकना तो दूर, हिलेंगे तक नहीं । अर्थात, नशा तो हर हाल में चाहिये, चाहे धर्म, आस्था और ईश्वर के माध्यम से प्राप्त हो, या फ़िर शराब और ड्रग के माध्यम से । चुनाव करना होता है, कि नशे का स्थायित्व किसके साथ है । यहां आनन्द के लिये नशे का कोई न कोई मार्ग तो चुनना ही पड़ता है । इधर, या फ़िर उधर । इधर यानि आस्था और ईश्वरीय प्याले से छलकती मय के साथ आरोग्य है, संतोष है, तृप्ति है, दीर्घायु है, और स्थाई आनन्द है । जबकि उधर, यानि अनास्था और नकली नशे के साथ रोग, असंतुष्टि, अतृप्ति, अल्पायु एवं क्षणिक आनन्द है । इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आस्तिक या नास्तिक अभिजात्य वर्ग से जुड़ी इकाई है, या कि निचले मोह्ल्ले की झुग्गियों से आता है । ईश्वरीय सत्ता में विश्वास एक वैज्ञानिक ज़रूरत है । चित्रलेखा के पात्र न इधर वाले हैं, न ही उधर वाले । ढोंगी हैं, इसलिये अधूरा जीवन जीने को अभिशप्त भी । साधुवाद ।

के द्वारा: आर. एन. शाही आर. एन. शाही

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

अमिता जी, आज आपको अवश्य अपने होने का गर्व हो रहा होगा मुझे तो अवश्य ही हो रहा है आपके होने का. क्योंकि आपने आज कोई भी उदाहरण दुसरे किसी महान लेखक या रचनाकार का नहीं दिया. क्योंकि मुझे ऐसा लगता है की हम उस उदाहरण की विवेचना में अपने मन की बात कह ही नहीं पाते सिर्फ उसके कहे पर ही विचार करते हैं जो हमारी सोच के नजदीक तो होता है किन्तु हमारी सोच नहीं होता. होना अवश्य ही अच्छा लगता है.कोई मुर्ख ही होगा जिसे इसमें अच्छा ना लगे. क्योंकि हम सदैव जीवन में अग्रणी बने रहना चाहते हैं. हार किसे मंजूर है? सही है मरने के बाद कुछ साथ नहीं जाएगा मगर हमारे होने को दुनिया भुला भी ना पाएगी. बहुत ही सार्थक आलेख बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: amitadixit amitadixit

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चिराग जैन साहब मुझे फेस बुक पर मिले उनका भेजा सन्देश मुझे पसंद आया, अमिता जी शायद आपको पसंद आये बीज ने बृक्ष से कहा तुम महान हो बृक्ष ने जबाब दिया ; पहले तुम जैसा ही था ; जैसे तुम अब हो, पहले मैं बिलकुल वैसा ही था यह सुनकर बीज सकुचा गया और जहाँ खड़ा था वंही धरती मैं गढ़ गया एक मिटटी का आवरण उस पर चढ़ गया समय के साथ कवच टुटा एक अंकुर उससे फूटा पानी हवा खाकर अंकुर बड़ा हो गया और मुस्करा कर बृक्ष के समीप खड़ा हो गया मनुष्य ने इश्वर से कहा तुम महान हो इश्वर ने जबाब दिया ; पहले तुम जैसा ही था ; जैसे तुम अब हो, पहले मैं बिलकुल वैसा ही था यह सुनकर मनुष्य सोचने लगा शब्दों में गूढ़ अर्थ बुझने लगा और जब कुछ भी न सूझा तो इश्वर को ही पूजने लगा

के द्वारा: RaJ RaJ

अच्छा लेख अमिता जी, लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ की धर्म एक अफीम के नशे की भाति है जिसमे व्यक्ति अपने सारे दुःख भूल जाता है. बस सबके अपने देखने का नजरिया है. धर्म में भी नशा है यह तो ठीक है और व्यक्ति इसमें अपने दुःख भूलता भी है लेकिन धर्म के नशे में और अफीम में बहुत बड़ा फर्क है. एक नशे से चेतना अचेतन की और जाती है और व्यक्ति अचेत हो कुछ समय के लिए अपने दुःख भूल जाता है किन्तु दुःख फिर भी अपने स्थान पर ही रहते है इसके विपरीत धर्म में व्यक्ति अचेतन से चेतन की और जाता है और दुःख को न भुलाकर उसे समाप्त ही कर देता है. एक सही धार्मिक व्यक्ति सदैव पूर्णतः चेतन अवस्था में रहता है सोते समय भी.

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

के द्वारा: amitadixit amitadixit

अमिता जी नमस्कार, बहुत ही अच्छी बात है आप आधे खाली गिलास के आधे भरे होने में ही संतोष कर लेती हैं.मैंने भी बीच के छूटे भाग के लिए यही कहा था ये फिल्मो की तरह हुआ है सही है यहाँ आपको पानी बहाना पड़ता वहां उनको पैसा बहाना पड़ता.और ब्रूस का ही क्यों सबका भगवान् सबके अंतर में है मगर प्रेरणा तो उसी मंदिर से आती है वरना मंदिर ही ना होते.और ये भी सही कहा आपने करके देखिए… अच्छा लगता है प्यार….मगर शायद कुछ लेट या ये कहूँ बहुत ही लेट. क्योंकि मेरी जिन्दगी का पहला सबक जो मेरी माता ने दिया था वो प्यार का ही था.फिर तो मै जैसे जैसे बढ़ता गया समझता गया प्यार क्या चीज है.आज मै बहुत ही अच्छे से समझता हूँ प्यार क्या चीज है.इतनी कंजूसी क्यों एक बार प्यार तो बार बार करने की चीज है. ये इश्वर की कायनात प्यार के दम पर ही तो टिकी है. इश्वर से प्यार, माता-पिता से प्यार,परिवार से प्यार,पेड़ पौधे नदी समन्दर पशु पक्षी धरती अम्बर और पूरी प्रकृति से क्या एक बार प्यार करके मन भरता है प्यार तो बार बार करने को मन करता है.मै भी यही कहूंगा अच्छा लगता है इंसान को अवश्य ही करना चाहिए........प्यार.........

के द्वारा: akraktale akraktale

अमिताजी, आपने बहुत पुरानी कव्वाली सुनी और उसके शब्द और ताल में खो गयीं.कव्वाली के बोल हैं ही इतने अच्छे की दीवाना बना देते हैं. मै तो कहता हूँ कि जहां हम डूब जाएँ वही समंदर है,चाहे आंसुओं का हो या अगाध जलनिधि का.दोनों में डूबने के बाद शान्ति है एक मन की एक तन की.और फिर उस डूबे को अंत तक क्या नजर आयेगा,सिर्फ पानी ही पानी.किसी भी रस में डूब जाना एक रस हो जाना सिर्फ इश्क नहीं दीवानगी है. आपने अंत में लिखा प्यास अधिक आनंददायक होती है तृप्ति से. मै नहीं मानता. प्यास की याद आनंददायक होती है तृप्ति के बाद.प्यास तो प्रथम घूंट से ही बुझ जाती है बाकी तो संतुष्टि है.प्यासे से पूछो जिसे एक घूंट भी नसीब ना हुई लब से ना आखों से, क्या उसे आनंद आयेगा?खैर आप ही कहती हैं ये दर्शन नहीं संगीत है सत्य है इसकी ही अनुभूति.साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

सही कहा आपने अमिता जी। ये इश्क़ है ही ऐसी शय। हमारी संस्कृति में भी यही बताया गया है कि भक्ति भी प्रेम से ही उपजती है और प्रेम को साक्षात् ईश्वर का दर्जा दिया गया है। प्रेम का मार्ग कठिन अवश्य है परन्तु कोई दृढ़तापूर्वक इस पर चलता रहे तो सफलता हाथ लगनी ही लगनी है। प्रेम तो एक शाश्वत भावना है, सर्वव्यापी है। वो चाहे लौकिक हो या अलौकिक। ग़ज़ल भी इसीलिए दो तरह की होती हैं - तग़ज़्ज़ुल और तसव्वुफ़ जो कि लौकिक और पारलौकिक होती हैं। आपने ये भी सही कहा कि तृप्ति से अधिक आनंददायक है प्यास क्यूंकि अगर अँधेरा न हो तो उजाले की महत्ता का बोध नहीं हो सकता। हाँ अबोध जी और आपको बताना चाहूँगा कि आपका पूरा लेख ही इस गीत का लिंक है आपके लेख में कही भी क्लिक करके इस क़व्वाली के यू ट्यूब लिंक पर पहुंचा जा सकता है। सुन्दर विचारों को साझा करने के लिए आपका आभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

भूल से अन्‍य पोस्‍ट की प्रतिक्रिया इसमें पेस्‍ट हो गई। जो इसके लिए लिखा वह डिलिट हो गया। कुछ ऐसा कहना चाहा था- संसार और इसके सर्जक को किसी शब्‍द में समेटा-बांधा जा सकता है तो वह ढाई आखर का  इश्‍क-प्रेम ही है।इस श्‍ब्‍द कैप्‍सूल में ब्रम्‍ह और उसका उसका विलास दोनों आ जाते हैं। यह तो ईश्‍वर भी बडा और महनीय है। ईश्‍वर भी प्रेम का प्‍यासा और इसके  वश में बताया जाता है। लेकिन इश्‍क दिमाग का खेल नहीं, दिल दा मामला है।हो गया तो फिर पनघट की डगर ब‍हुत कठिन नहीं अपितु सर्वाधिक सरल सुगम है- करगत। प्रेम द्वंद्व का मिटना है, अद्वैत है। कब आशिक माशूक और माशूक आशिक हो जाए कहा नहीं जा सकता। यह ऐक्‍य है, सम्‍पूर्णता है।

के द्वारा: sd vajpayee sd vajpayee

के द्वारा: amitadixit amitadixit

हाहाहा अशोक जी... सी सिटी के भी आजकल के तेवर बदले हुए हैं। अब ये अलग बात है कि ये मलाई कुछ ही लोगों के हिस्से में हैं, जैसा कि हर जगह, हर दौर में होता आया है। यदि ऐसा न होता तो आक्यूपाई वॉल स्ट्रीट का दौर नहीं चल रहा होता। और ये कि रोने वाला खुद न समझे और दूसरा समझ जाए ये मामला तो प्यार का है... करके देखिए, बहुत मजेदार चीज है। और यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले बच्चे नहीं होते अशोकजी जवान होते हैं... बीच का समय इसलिए गुल कर दिया कि इस बीच बहुत पानी बहाना पड़ता। फिर कहानी लंबी हो जाती है और किश्तों में चलती ;-) और आप ब्रूस के भगवान को मंदिर में न देखें, समस्या स्वतः ही सुलझ जाएगी... करके देखिए... अच्छा लगता है ;-) प्यार...

के द्वारा: amitadixit amitadixit

अमिताजी, कहानी बहुत अच्छी है किन्तु बिलकुल बॉलीवुड की तरह है जहाँ हीरो हेरोइन से बचपन में बिछड़ता है और जवानी में मिलता है.उसकी एंट्री भी कुछ इसी तरह होती है जैसी इस कहानी में शोपिंग के बाद सीधे हीरो पति के रूप में सामने आता है. मै ये बात नहीं समझ सका की इतनी ढेर सारी शोपिंग के लिए "सी" ग्रेड सिटी को क्यों चुना? सी ग्रेड सिटी वालों को तो सुबह का दूध मेहमानों की चाय पर खर्च हो जाए तो शाम को बच्चों को बिना दूध दिए ही सुलाना होता है. फिर रोने वाला खुद ना समझे और सामने वाला समझ जाए ये भी अजीब मायाजाल है.और उस भगवान् की कहानी है जो कलियुग में तो कहीं बेचारा नजर नहीं आता, बेचारे तो वो हैं जो उसकी प्रतिमा पर टनों से सोना चढाते हैं और अपना नाम भी नहीं बता पाते. आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय अमिता जी ....सादर अभिवादन ! इस मंच का एक और रीता हुआ रीति रिवाज है की कमेन्ट के बदले में कमेन्ट करे ..... आपसे गुजारिश है की कम से कम आप इस राजनीति में न पड़े ..... आप अपना जो कीमती समय प्रतिकिर्याओ को देने में लगाएंगी उसकी वजह से आपकी सर्वोत्तम रचनाओं को न पढ़ पाने का जो नुक्सान हमे उठाना पड़ेगा वोह आपके द्वारा दी गई टिप्पणी से प्राप्त फायदे के मुकाबले कही ज्यादा होगा ..... ************************************************************************************************* मेरे कहने का यह मतलब था की कहानी का अंत कैसा भी हो हमे तो आपकी शैली से मतलब है ..... हा हा हा हा हा http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/10/17/“खुदा-का-खत”/ :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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हाहाहा... कुछ खास मेरे पास है नहीं बताने को। एक हिंदी अखबार शायद नाम सुना हो नईदुनिया के फीचर विभाग में काम कर रही हूँ। इंदौर शहर में रहती हूँ। पोलिटिकल साइंस में पीएच.डी. किया है, विषय थोड़ा दार्शनिक है। पढ़ने में रूचि बहुत पहले से थी, इसलिए अलग-अलग विषयों पर पढ़ती हूँ, पति ने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया तो लिखना शुरू कर दिया। अब लगता है कि पहले क्यों नहीं सोचा इस विषय पर...। जागरण जंक्शन से बाहर तीन ब्लॉग लिख रही हूँ। कुछ हिंदी पत्रिकाओं में दो-तीन साल पहले कहानियाँ प्रकाशित हुई थी। एकाध के पंजाबी में अनुवाद की अनुमति भी माँगी गई थी। साहित्य के अतिरिक्त दूसरा पागलपन संगीत है और बस इन्हीं दोनों विधाओं के इर्द-गिर्द जिंदगी घूम रही है। अपने जीवन के अनुभवों को ब्लॉग के जरिए सबसे बाँट रही हूँ, इन्हीं में से कभी लेख बन आता है तो कभी कहानी। सायास लिखने की कला को अभी साध नहीं पाई हूँ। फोर्स से जो बाहर आता है, उसे ही शब्दबद्ध कर देती हूँ। इतना ही...

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अमिता जी, नमस्कार! "इन सालों में मैंने जाना है कि मैट्रोज या बड़े शहर कुछ प्रोड्यूज नहीं कर पाते हैं, दे आउटसोर्स इच एंड इवरीथिंग…..इवन इमेजिनेशन…. क्रिएटिविटी एंड ओरिजनलिटी ऑलसो….। सारे लोग जो इस शहर के आकाश में टिमटिमा रहे हैं, वे सभी छोटे शहरों से रोशनी लेकर आए हैं, इस शहर को जगमगाने के लिए….। अभी इस पर विचार करना या रिसर्च करना बाकी है कि ऐसा क्यों होता है, क्या बहुत सुविधा ये सब कुछ मार देती है या फिर समय की कमी इस सबको लील जाती है….?" आपने अंतिम किश्त में बड़े ही सुन्दर तरीके से कहानी या कहें कि जीवन के सार को बता दिया है! बहुत हे रोचक और प्रेरणादायी रचना के लिए बधाई स्वीकारें! - जवाहर.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: munish munish

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के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

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आदरणीय डाक्टर साहिबा अमिता जी ......सादर अभिवादन ! सबसे पहले तो मैं तहेदिल से आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ की आपने अपने ब्लॉग का पता अपनि पिछली पोस्ट में बता कर उपकार किया था ..... मुझको अगर कोई कैसेट या गाना ज्यादा पसंद आता है तो उसको मैं कम सुनता हूँ –इस दर से की कहीं इसके प्रति मेरा क्रेज कम न हो जाए ...... इसीलिए आपका सिर्फ एक ही ब्लॉग पढ़ा है ..... यह वाला भी हालाँकि वाहन पर विराजमान है लेकिन सोचा था की इसको अगली यात्रा पर पढूंगा .... लेकिन आपने खुद ही इसको यहाँ पढ़ने का सोभाग्य प्रदान कर दिया ..... लेकिन एक बात बहुत ही विचित्र लगी की आपके ब्लॉग पर कमेन्ट पोस्ट होने के बाद+ एड होने के बावजूद दुबार वाहन जाने पर नजर नहीं आता है ..... ऐसा लगता है की आपका पासवर्ड किसी और के पास भी है जोकि नहीं चाहता की वाहन पर कोई आपकी रचनाओं की तारीफ करे .... या फिर कोई तकनीकी त्रुटि होगी ...खैर जो भो हो आपको फिर से धन्यवाद व् बहुत -२ आभार :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/25/“वेश्यावृत्ति-को-कानूनी/

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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के द्वारा: RaJ RaJ

भूख…विकास की आड़ में फैलती-पनपती भूख… विकास को जस्टिफाई करती…. उसे डिफाइन करती भूख…. बाजार सिर्फ भूख ही पैदा कर सकता है…. उसे तृप्त करना बाजार के बस का रोग नहीं है। बाजार द्वारा पैदा की गई हवस और उसकी तृप्ति के गुमनाम रास्तों से आया मवाद सारे समाज में फैल गया है। आपकी हर रचना से इस ब्लॉग साईट का स्तर ऊँचा होता कभी दर सा लगता है आप कहीं गुम न हो जाये कही और लिखने लगे | किसी दिन शोहरत और कामयाबी आपको कोई प्रसिद्द लेखिका बना अवश्य देगी तब आप पुराने प्रशंषको न भूल जाना | शब्दों व् भाषा के बेहतरीन शिल्प पीछे छुपे निश्छल हृदय व विलक्षण मेधा का अजीब संगम आप में है | बधाई बधाई से आगे जो कुछ भी | पढ़ लें जबाब की दरख्वास्त नहीं है

के द्वारा: RaJ RaJ

सही है राज जी, मैं भी पढ़ती बहुतों को हूँ, बहुत सारे ब्लॉगर्स बहुत अच्छा लिख रहे हैं, लेकिन कमेंट करने का कर्मकांड साध नहीं पाती हूँ। ज्यादातर अपने ही जैसे किसी पढ़नेवाले को ब्लॉग का पता दे देती हूँ कि - 'देखो आजकल के बच्चे कितना अच्छा लिख रहे हैं।' इससे ज्यादा कुछ हो ही नहीं पाता। आखिर कितना कुछ है करने को और दिन वही 24 घंटों का... अब इसमें जितना जरूरी हुई उसे निभा दिया। आपकी प्रतिक्रिया ने सुकून पहुँचाया है। अच्छा है, बहुत अच्छा है से आगे... लगा कि अपना जिया कुछ ऐसा भी है, जो किसी को अपना-सा लगे। फिर से शुक्रिया। आपकी प्रतिक्रिया के जवाब देने से मैं खुद को रोक नहीं पाई... आशा है समझेंगे। :)

के द्वारा: amitadixit amitadixit

अभी अभी जो लिखा किसी गलती कारण प्रेषित नहीं हो पाया sorry you have to be logged in लिखकर आगया इस बार कुछ ऐसा न हो | वैसे तो ब्लोगर्स का व्यवहार निभाना इस मंच पर चलता रहता है | जिनको में प्रातक्रिया दे ता हूँ वे मुझे दे देते हैं | इस तरह रचना कम रचनाकार से सम्बन्ध ज्यादा निभाए जाते है | आपकी रचनाओं के साथ मेरे से यह सब नहीं हो पता | आपकी रचना में अजीब सा खिचाव अपने को अभिव्यक्त करने का बड़ा सजीव और दिल अंदरक तक पहुँचने वाला हुनर है इनमें \ आप इसी तरह लिखते रहिये ताकि मैं प्यास बुझा संकू और कभी अपने भीतर उतर संकू | रचनाये काफी स्थिर व् भावनाए बड़ी गहरी हैं | बहुत शिद्दत महसूस की गयी अन्तरंग सी लगती हैं | आप से यही चौंगा की आप ऐसा लिखते रहें की में अपना लिखना भूलकर इन्हें पढता रहूँ | हर किसी को अपने ब्लॉग का एड्रेस देकर उनसे अपने लिए लिखवाना चाहता हूँ पर आपको केवल पढना चाहता हूँ प्लीज़ जबाब देने में समय लगाने की वजाय नयी कृति से रूबरू कराएँ., अमिताजी

के द्वारा: RaJ RaJ