अस्तित्व विचारशील होने का अहसास

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आस्था जुड़े संवेदना से, तब बात हो

Posted On: 5 Apr, 2013 Others में

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बड़े लंबे समय से महाकाल मंदिर जाने की इच्छी थी। हर बार उज्जैन जाने का प्लान बनाते, लेकिन महाकाल नहीं जा पाते। उस दिन उसने सोचा कि क्यों नहीं उज्जैन पहुंचते ही पहले महाकाल मंदिर चले जाए, फिर कुछ और किया जाए। पता नहीं क्यों उस दिन अपेक्षाकृत ज्यादा भीड़ थी। गर्भगृह में उसने देखा कि कई लोग दूध के पैकेट्स लेकर आए हैं, वहीं पैकेट फाड़ कर पूरा का पूरा पैकेट शिवलिंग पर उंड़ेल रहे हैं। अनुशीला की आंखें फटी रह गई… उसने एक भक्त से पूछा ‘क्या ये अच्छा नहीं होता कि ये दूध यहां बेकार करने की बजाए आप बाहर बैठे गरीबों को दे देते?” उसने घूरकर अनुशीला को देखा… ‘शिवलिंग के स्नान को आप दूध का बेकार हो जाना कह रही हैं!” उसने जिस आक्रामकता से अनुशीला को जवाब दिया, इससे उसके मन में एक सवाल उठा कि भले ही आस्था के पीछे तर्क नहीं होते, लेकिन क्या आस्था में मानवीय संवेदना भी नहीं होती…?
नागपंचमी के समय चोरी-छिपे सपेरे नागों को लेकर गली-मोहल्लों और कॉलोनियों में घूमते हैं, पकड़े जाने वालों के हाथ से तो सांप बच जाते हैं, लेकिन जो नहीं पकड़े जाते हैं, जाने उनके पास के सांपों का क्या हुआ करता होगा? क्योंकि लाख प्राणीशास्त्री कह लें कि सांप दूध नहीं पीते हैं, बल्कि जबरदस्ती दूध पिलाने की प्रक्रिया में कई बार सांपों की मृत्यु भी हो जाती है, लेकिन वे कहते रहें, हम तो वही करेंगे जो हम करते आ रहे हैं। आखिर तो यही हमारी परंपरा है, हमारी संस्कृति…। और जब मामला संस्कृति का हो तो फिर हर सवाल जैसे इस सनातन संस्कृति की सनातनता पर ही सवाल हो जाता है।
परंपराएं हमारे जीने के सहज नियम की तरह है। जो हमें सामाजिक, प्राकृतिक, आर्थिक, पारिवारिक और धार्मिक जीवन में व्यवहार करने के निर्देश देते हैं। ये ऐसे नियम है जो हमें अपने समाज, पर्यावरण, धर्म, परिवार हर चीज से जोड़ते हैं, हमें सबके प्रति जिम्मेदार होना सिखाते हैं, ये हमें कर्तव्य और अधिकारों में संतुलन की शिक्षा देते हैं। इसलिए ये रूढ़ नहीं हो सकते हैं। न रूढ़ होना इनका लक्ष्य ही हुआ होगा। परंपराओं का सृजन वक्त, जरूरत और परिस्थितियों को देखते हुए ही हुआ होगा, इसलिए अब इसमें बदलाव भी उसी के अनुरूप होने चाहिए।
श्राद्ध-पक्ष चल रहे थे। दादी की बड़ी इच्छा थी कि दादा के श्राद्ध पर ब्राह्मण भोजन करवाए… नवीन शहर में बड़ी मुश्किल से 5 ही ब्राह्मणों को जुटा पाया, उसमें से भी तीन ने कहा कि ‘भोजन तो नहीं कर पाएंगें, हां मिठाई ले लेंगे।” दादी को निराशा हुई। लेकिन सवाल तो उठा ही कि आखिर घर के हर शुभ-अशुभ में ब्राह्मणों की भूमिका के विधान के मायने क्या है? हकीकत में ब्राह्मणों को शामिल करना हमारी उस वर्ण व्यवस्था का अहम हिस्सा था, जिसके तहत ब्राह्मणों ने समाज में शिक्षा की जिम्मेदारी ली थी, पठन-पाठन उनका एकमात्र कर्म और ध्ार्म था। और इस वजह से ब्राह्मणों और उनके परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाज की थी। ये एक दो-तरफ व्यवस्था थी जिसे हमने इतना रूढ़ कर दिया है कि खुद अर्जन करने वाले ब्राह्मणों को जो कि खुद ही इस व्यवस्था से अलग हो गए हैं, खींच कर इसका हिस्सा बनाने पर तुले हुए हैं।
अभी चैत्र नवरात्र शुरू हो रही है। इसमें हमारे यहां कन्या-पूजन का विधान है, कन्या-भोज भी होता है। वो भी या तो अष्टमी के दिन या फिर नवमी के दिन। शारदीय नवरात्र में भी यही सब कुछ होता है। उन दो दिनों में गली-मोहल्लों और कॉलोनियों की ‘कन्याओं” की ढूंढाई होती है और उन दो दिनों में ही उन्हें हर कोई खिला देना चाहता है। मानो कि उससे पहले या उसके बाद खिलाने से स्वर्ग में बंट रहे पुण्य का हिस्सा उनके लिए नहीं बचेगा या फिर वे पुण्य-प्राप्ति की इस दौड़ में पीछे रह जाएंगें। चाहे फिर वे छोटी-छोटी लड़कियां अपच से बीमार ही हो जाए। और तो और ये सिलसिला घरों से निकलकर संस्थाओं तक पहुंच गया है। उन्हीं दिनों में वे सैकड़ों की संख्या में कन्याओं को भोज के लिए आमंत्रित करते हैं चाहे फिर उनका प्रसाद खाकर बच्चियां बीमार हो जाए।
हाल ही में घरों में शीतला-सप्तमी मनाई गई। एक शाम पहले ही घरों में खाना बन गया और उसी खाने को अगले दिन खाया गया, परंपरा के तौर पर…। जबकि चिकित्सा विज्ञान कहता है कि बासी खाने से हर हाल में बचा जाना चाहिए, लेकिन हमने शीतला-सप्तमी का एक रूढ़ रस्म की तरह निर्वहन किया, करते आ रहे हैं और करते ही रहेंगे। असल में शीतला-सप्तमी गर्मी की शुरुआत में आती है। और ये इस बात का संकेत है कि अब मौसम बदल रहा है तो हमें अपने खान-पान और रहन-सहन में भी बदलाव करना चाहिए। सर्दियों में खाने वाले गर्म तासीर के खाने की जगह अब हमें ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों को अपने रोजमर्रा के खाने में शामिल करें। गर्म दूध की जगह ठंडा दूध, शर्बत, दही, लस्सी, छाछ… रसीले फल आदि। लेकिन हमने इसका इंटरप्रिटेशन बासी खाने की तरफ मोड़ दिया। और भी ऐसी बहुत सारी परंपराएं होंगी जिनका स्वरूप वक्त के साथ विकृत हो गया है और हम उसकी मूल भावना तक पहुंचने की बजाए बस लकीर ही पीटने में लगे हुए हैं।
यदि गौर से हम अपने समाज विधान को देखें तो पाएंगें कि इसमें बहुत बारीकी से हर ‘व्यवस्था” पर विचार किया गया है। समाज को सिर्फ वर्गों की ही जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है, बल्कि पेड़-पौधों, नदी-पहाड़, पशु-पक्षी हरेक के लिए हम इंसानों के कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। बहुत दूर तक और बहुत बारीकी से जीवन के स्वरूप का अनुमान लगा लिया गया था। बहुत गहराई से इस बात को भी समझ लिया गया था कि प्रकृति और मौसम से इंसान का रिश्ता कितना अनूठा है और ये भी कि बिना इसके इंसान का वजूद नामुमकिन है, इसलिए इसके साथ हमें दोस्ती का रिश्ता निभाना ही होगा, जिम्मेदारी और सम्मान का भी। तभी तो हमारे पर्व-परंपराओं में चाहे धर्म और अर्थ ही प्रत्यक्षत: दिखाई देते हों, कहीं बहुत गहरे इनमें मौसम और प्रकृति ही होगी। यहां मुश्किल ये है कि हम परंपराओं का निर्वहन न मन से कर रहे हैं और न बुद्धि से… यदि दोनों में से कोई एक भी चीज होती तो हम दूध बहाकर, सांपों को दूध पिलाकर, पेड़-पौधों को काटकर अपनी आस्था को आधार देने की बजाए यह जानने की कोशिश करते कि आखिर इन परंपराओं का मूल स्रोत क्या है? और इनका दर्शन क्या है? तभी हम न्याय कर पाएंगे धर्म से, समाज से, पर्यावरण से और खुद के इंसान होने के तथ्य से भी।



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shalinikaushik के द्वारा
April 7, 2013

हकीकत में ब्राह्मणों को शामिल करना हमारी उस वर्ण व्यवस्था का अहम हिस्सा था, amita ji brahman ko khilana koi uske pet ko bharne ke liye nahi apitu apne dan ko bhagwan tak pahunchane ke liye hota tha .bina swarath ke koi kuchh nahi karta .sarthak prastuti .

    amita neerav के द्वारा
    April 8, 2013

    शालिनीजी ये बहुत मासूम और अपरिपक्व सोच है। ये किसने कहा कि ब्राह्मणों को दिया हुआ भगवान तक पहुँचता है! क्या आप ये मानती हैं कि हमारे सारे ग्रंथ खुद ‘ईश्वर’ ने रचे हैं…? यदि हाँ तो फिर कहना पड़ेगा कि आप भी बरसों से चली आ रही परंपरा का ही हिस्सा है। परंपरा ने आपको इस कदर जकड़े रखा है कि आप तर्क और बुद्धि का इस्तेमाल ही भूल गई हैं। मुझे माफ करेंगी ये कहने के लिए कि सवाल उठाएँ, जो जवाब मिलेंगे वो आपको चौंकाने लगेंगे। यदि आप सामाजिक षड़यंत्र को ईमानदारी से समझना चाहती हैं तो, अन्यथा जो आप सोचती हैं, वही इस देश के खून में चला आ रहा है… तो फिर ऐसे ही सब कुछ चलता भी रहेगा। एक बार फिर स सोचिए…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 6, 2013

प्रकृति और मौसम से इंसान का रिश्ता कितना अनूठा है और ये भी कि बिना इसके इंसान का वजूद नामुमकिन है, इसलिए इसके साथ हमें दोस्ती का रिश्ता निभाना ही होगा, जिम्मेदारी और सम्मान का भी। तभी तो हमारे पर्व-परंपराओं में चाहे धर्म और अर्थ ही प्रत्यक्षत: दिखाई देते हों, कहीं बहुत गहरे इनमें मौसम और प्रकृति ही होगी। यहां मुश्किल ये है कि हम परंपराओं का निर्वहन न मन से कर रहे हैं और न बुद्धि से… यदि दोनों में से कोई एक भी चीज होती तो हम दूध बहाकर, सांपों को दूध पिलाकर, पेड़-पौधों को काटकर अपनी आस्था को आधार देने की बजाए यह जानने की कोशिश करते कि आखिर इन परंपराओं का मूल स्रोत क्या है? और इनका दर्शन क्या है? तभी हम न्याय कर पाएंगे धर्म से, समाज से, पर्यावरण से और खुद के इंसान होने के तथ्य से भी। सार्थक लेख, बधाई आदरणीया सादर

sudhajaiswal के द्वारा
April 5, 2013

अमिता जी, बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक आलेख के लिए हार्दिक बधाई |


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