अस्तित्व विचारशील होने का अहसास

ये जीवन के अनुभव, विचार, दर्शन और कभी-कभी कहानी के तौर पर अभिव्यक्ति है, बस...।

93 Posts

757 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5760 postid : 263

रिश्तों का प्रोटोकॉल...:-)

Posted On: 16 Mar, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

जानने का क्रम तो हर वक्त चलता ही रहता है, लेकिन हर बार का जानना समझ तक कब पहुँचेगा ये कहा नहीं जा सकता है। अब अंतर्राष्ट्रीय संबंध पढ़ने के दौरान जाना था कि चाहे दो देश युद्धरत हों, लेकिन उनके राजनयिक संबंध फिर भी बने रहते हैं। मतलब दो देशों के बीच युद्ध चल रहा है, लेकिन राजदूत दूसरे देश में उसी तरह कार्य करते रहते हैं, जैसे शांतिकाल में काम करते हैं।
डिप्लोमेसी के प्रोटोकॉल के तहत राजदूतों की वापसी संबंध खत्म होने का संकेत है। मतलब ये कदम बहुत गंभीर स्थितियों में ही उठाया जाता है। युद्ध से भी ज्यादा गंभीर है राजदूतों को वापस बुला लिया जाना… एक तथ्य था, जिसे जस-का-तस ग्रहण कर लिया।

ननिहाल चूँकि शहर से बाहर था, इसलिए ताईजी का मायका ही हमारा ननिहाल हुआ करता था। उस पर वहाँ थे हमउम्र बच्चे… अब ये अलग बात है कि ताईजी को लगता था कि मुझे छोड़कर दुनिया में हर बच्चा बदमाश है और मुझे परेशान करना हर बच्चे का एक-सूत्री कार्यक्रम ही है। इसलिए वे अपने भतीजों-भतीजियों से-जो कि मेरे हमउम्र हुआ करते थे और इसलिए उनके साथ खेलने का लालच भी हुआ करता था-दूर ही रखती थीं।
खैर थोड़े-थोड़े बड़े हुए तो सारों में ही जैसे समझ आ गई और लड़ाई-झगड़े कम हो गए। ताईजी को भी यकीन हो गया कि सारे बच्चों ने अपने कार्यक्रम में तब्दीली कर ली है, सो अब गाहे-ब-गाहे हम ‘मामा’ के घर में ही रहने लगे। तीन मंजिला मकान के हर फ्लौर पर एक परिवार रहता था… तीन भाईयों का परिवार जो था… आने-जाने का रास्ता एक ही था, इसलिए वैसा ‘सेपरेशन’ नहीं था, जैसा कि फ्लैट्स में हुआ करता था। फिर इतने सारे बर्तन थे तो हर दिन खड़कने की आवाजें आया करती थी। ‘छोटे’ बर्तनों के खड़कने से ज्यादा आवाज़ तो ‘बड़े’ बर्तनों के खड़कने की आया करती थी, लेकिन छोटों की दुनिया पर उसका कोई असर नहीं हुआ करता था।
खिचड़ी सारे बच्चों की पसंदीदा डिश हुआ करती थी। और ये तय था कि जिसके भी घर में खिचड़ी बननी हैं, सारे बच्चे उसी घर में धावा बोलेंगे। और ऐसा मंजर बहुत बार पेश आया कि किसी के घर में खिचड़ी खाने के लिए बच्चे जमा हुए हैं, बच्चे बहुत प्रेम औऱ चाव से खिचड़ी खा रहे हैं, लेकिन बच्चों की माँओं के बीच जमकर तकरार हो रही है। मतलब बच्चे एक-दूसरे को छेड़ भी रहे हैं, थाली में से मूँगफली के दाने या फिर मीठे अचार की फाँके चुराकर खा रहे हैं और मीठी-मीठी लड़ाईयाँ भी कर रहे हैं, लेकिन बड़ों की तकरार के प्रति बिल्कुल उदासीन है।

बचपन का ये किस्सा और फिर यूनिवर्सिटी में पढ़ा सबक समझ के किस सूत्र तक ले जा रहे हैं? डिप्लोमेसी ये कहती है कि संवाद हर सूरत में कायम रहना चाहिए… तमाम युद्धों और खराब हालात के बावजूद… क्योंकि बात से ही बात निकलती है। ये सूत्र व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर देशों के बीच के रिश्तों पर भी समान रूप से लागू होती है। कह लें, निकाल लें मन की भड़ास… फिर बढ़े आगे… यदि रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं तो… चुप रहने से गड़बड़ाते हैं रिश्ते, घुट जाती हैं भावनाएं और बंद हो जाते हैं, एक-दूसरे की ओर जाने वाले रास्ते… फिर…!



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
March 19, 2013

वो डिप्लोमेसी ही क्या, जहाँ कथनी और करनी में लम्बा सा गैप न हो । सबकुछ इटालियन-इटालियन सा लगता है । पर उपदेश कुशल बहुतेरे, छाए हैं घनघोर अंधेरे, ये हैं जनम-जनम के फ़ेरे …

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 17, 2013

संवाद बहुत जरूरी होता है विषय वस्तु बढ़िया बधाई आदरणीय अमिता जी सादर s

jlsingh के द्वारा
March 17, 2013

अमिता जी, सादर अभिवादन! बिलकुल सही कहा आपने – संवाद हर सूरत में कायम रहना चाहिए…संवाद हीनता की स्थिति में दूरियां बढ़ती जाती है और रिशत गायब से हो जाते हैं!

omdikshit के द्वारा
March 16, 2013

अमिता जी, नमस्कार. बहुत ही सरल भाषा में,यथार्थ की प्रस्तुति.


topic of the week



latest from jagran