अस्तित्व विचारशील होने का अहसास

ये जीवन के अनुभव, विचार, दर्शन और कभी-कभी कहानी के तौर पर अभिव्यक्ति है, बस...।

93 Posts

757 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5760 postid : 262

चलो बनाएँ अपना स्वर्ग

Posted On: 6 Mar, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

‘‘यदि ईश्वर ने ही औरतों के लिए यह जीवन रचा है तो फिर कहना होगा कि आपका ईश्वर सामंतवादी पुरुष है…’’ -जब ये कहा था उसने तो कई लोगों ने उसे घूरकर देखा था… माँ ने भी। जाहिर है ये ईश्वर की सर्वशक्तिमान सत्ता की कथित नीतियों पर ‘अन्याय’ का आरोप था। और ईश्वर पर आरोप कतई-कतई सह्य नहीं है।
धीरे-धीरे जब उसने समाज को और बारीकी से जानने की कोशिश की तो उसे लगा कि धर्म के बहाने हर कहीं औरतों को मर्यादा, शालीनता, कर्तव्यपरायणता और समर्पण की हिदायतें दी जाती हैं, पालन करने के लिए कभी दंड की धमकी, तो कभी आदर्श होने का प्रलोभन… हो सकता है ये विचार सख्त महिलावादी लगे लेकिन वो इस तरह से सोचती है क्या किया जा सकता है?
उसे नजर आता है कैसे लड़कियों को अच्छी लड़की बनने के लिए किस तरह से उदाहरण दिए जाते हैं। क्यों सावित्री-सत्यवान और रति-कामदेव की कथाएँ कही जाती है, क्यों लक्ष्मी-विष्णु के हर केलैंडर में लक्ष्मी, विष्णु के पैर दबाती नजर आती है… क्यों सीता-त्याग को राम की मर्यादा पुरुषोत्तम वाली छवि से महिमामंडित किया जाता है? क्यों कृष्ण राधा को छोड़कर चले जाते हैं… वो प्रेम तो एक शादीशुदा महिला से कर सकते थे, लेकिन विवाह नहीं कर सकते थे… वो सोचती है, क्यों…? जवाब था एक ही… ‘ईश्वर सामंतवादी पुरुष है।’ लेकिन एक दिन उसे लगा कि जिसे हम ईश्वर समझते हैं, दरअसल वो तो बड़ी दुनियावी कल्पना है… ईश्वर तो निराकार, निर्विकार है… यदि है तो…। तो अब तक ईश्वर के नाम पर जो कूड़ा-कबाड़ फैला हुआ है, वो तो इंसान की ‘लीला’ है। मतलब… कि ये सारा जो ईश्वर के नाम पर धर्म में हुआ करता है, वो सब तो इंसानी करामात है…कुछ पूर्वाग्रही, कुछ पीड़ित और बहुत सारे षडयंत्रकारी पुरुषों के पूर्वाग्रह, कुंठा और षड़यंत्र… मामला साफ तब हुआ जब उसने वर्तमान में विचारों के जंजाल और बचपन की स्मृति के निहितार्थों के बीच संबंध स्थापित किया।
याद तो नहीं कि किस धार्मिक ग्रंथ के चित्र उसे दिखाए जाते थे, लेकिन उसमें छपे वे चित्र उसे अब भी उसी तरह याद है, जैसे उसने उस किताब में अपने बचपन में देखें थे। नर्क के फोटो… एक ही पेज पर कभी तीन तो कभी चार फोटो… ले-आऊट भी बड़ा अटपटा…। किसी फोटो में कुछ राक्षस जलती भट्टी के आसपास खड़े हैं और भटटी पर बड़े से कड़ाह में तेल गर्म हो रहा है। उसमें कोई मनुष्य पड़ा रो रहा है… वो कल्पना करने की कोशिश किया करती थी कि उस गर्म तेल से कितनी जलन हो रही होगी…, फिर किसी में मनुष्य को सुए चुभोए जाते हुए भी दिखाया गया था और भी कई… उन फोटो में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नजर नहीं आता था… गोयाकि नर्क तो दोनों के लिए एक-सा ही था। और स्वर्ग… ? ये सवाल जब उसने बचपन में ही किया था तो जवाब देने वाला गफ़लत में आ गया था। स्वर्ग उसमें ठंडी-ठंडी हवाएँ बहती है, झरने बहते हैं, खूबसूरत फूल खिलते हैं, मद्य (सीधे कहते हुए भावना अकड़ी जाती है- दारू…) और सुंदरी…। उसने मान लिया, लेकिन उस दिन जब उसने कड़ियाँ जोड़ी तो सवाल उठा – ‘ये सब तो पुरुषों के लिए हैं, हम महिलाओं के लिए स्वर्ग कैसा है।’ जवाब था ही नहीं तो मिलता कैसे…? बस यहीं से उसके दुख शुरू हो गए। महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है ही नहीं, मतलब उसके लिए तो दोहरा नर्क है… एक जो धार्मिक कथाओं में है और दूसरा ‘पृथ्वीलोक’… ‘मृत्युलोक’…। तो नर्क में तो कोई अंतर नहीं है, हाँ अघोषित रूप से स्वर्ग तो सिर्फ पुरुषों के लिए ही है…।

तो आजकल वो लगी है, स्त्रियों के लिए स्वर्ग का ‘कंसेप्ट’ बनाने में… आइए जरा उसकी मदद कीजिए… ।



Tags:           

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

9 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
March 24, 2013

सादर, बहुत दुखद है जिसे प्रकृति ने कष्ट दिए हैं मानव की मानवता ने भी उसे कोई सहारा नहीं दिया.

graceluv के द्वारा
March 12, 2013

Hello Dear! My name is Grace, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (gracevaye22@hotmail.com) Greetings Grace

yogi sarswat के द्वारा
March 11, 2013

ये सवाल जब उसने बचपन में ही किया था तो जवाब देने वाला गफ़लत में आ गया था। स्वर्ग उसमें ठंडी-ठंडी हवाएँ बहती है, झरने बहते हैं, खूबसूरत फूल खिलते हैं, मद्य (सीधे कहते हुए भावना अकड़ी जाती है- दारू…) और सुंदरी…। उसने मान लिया, लेकिन उस दिन जब उसने कड़ियाँ जोड़ी तो सवाल उठा – ‘ये सब तो पुरुषों के लिए हैं, हम महिलाओं के लिए स्वर्ग कैसा है।’ जवाब था ही नहीं तो मिलता कैसे…? बस यहीं से उसके दुख शुरू हो गए। महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है ही नहीं, मतलब उसके लिए तो दोहरा नर्क है… एक जो धार्मिक कथाओं में है और दूसरा ‘पृथ्वीलोक’… ‘मृत्युलोक’…। तो नर्क में तो कोई अंतर नहीं है, हाँ अघोषित रूप से स्वर्ग तो सिर्फ पुरुषों के लिए ही है…। तो आजकल वो लगी है, स्त्रियों के लिए स्वर्ग का ‘कंसेप्ट’ बनाने में… आइए जरा उसकी मदद कीजिए श्री शाही जी की प्रेरणा ज्यादा बेहतर लगती है !

shalinikaushik के द्वारा
March 9, 2013

बहुत सही विश्लेषण .सराहनीय प्रस्तुति अमित जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 7, 2013

इश्वर ने सबको एक बनाया हर हाथों को काम थमाया स्त्री पुरुष जीवन रथ के पहिये प्रेम पूर्र्वक संग संग रहिये मिलते कंटक चलते पथ घायल होता जीवन रथ आयें इसे साथ दौडाएं व्यर्थ में भिन्न परिभाषा न गायें सार्थक लेख बधाई दिवस एवं लेख दोनों हेतु.

आर.एन. शाही के द्वारा
March 7, 2013

मेरे विचार से स्त्री के स्वर्ग के लिये कंसेप्ट पश्चिम से आयात कर लेना मुफ़ीद रहेगा । क्योंकि जहाँ के स्वर्ग को सिर्फ़ पुरुषों की सुविधानुसार गढ़ा गया हो, उस देश के थिंक टैंक में इतने बड़े-बड़े आइडियाज क्या खाक़ पैदा होंगे ? इतने महान आइडियाज वहीं से खरीदे जा सकते हैं, जहाँ की महिलाएँ प्रकृति द्वारा अबला बनाए जाने के बावज़ूद सबला हैं । जिन्हें दूर-दूर तक, विदेशों तक की यात्रा अकेले करते हुए घूम आने में कोई डर नहीं लगता । देर रात धरती के किसी कोने या बीच पर घूमते हुए यदि उनके साथ कुछ अघटित भी हो जाय, तो उनकी बला से । पहले निर्लिप्त भाव से तूफ़ान को शांत होने देंगी, फ़िर सोचेंगी कि आगे किसी और कार्रवाई का मूड है या नहीं । यदि भारतीय स्त्री भी इतनी जल्दी इस स्तर की डेयरडेविल बन सके, तो उसे अवश्य अब अपने लिये स्वर्ग का निर्माण कर ही लेना चाहिये । लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी स्थितियाँ पूरी तरह निर्मित हो पाने में अभी कुछ विलम्ब है । योजनाएँ पाइपलाइन में हैं, प्रक्रिया अन्डर प्रोसेस है, परन्तु अभी भी सबकुछ कच्चा-कच्चा सा है । अभी भी तमाम ऊँची उड़ानों के बावज़ूद भारतीय स्त्री अकेले कहीं दूर जाने से डरती है । तारिका है तो आउटडोर शूटिंग पर मम्मी-पापा को साथ लिये बिना नहीं जाना चाहती । नई सर्विस ज्वाइन करने के लिये भी उसे पैरेंट्स का साथ चाहिये । देर रात सिनेमा देखना है, तो कम से कम अंतरंग ब्वायफ़्रेंड चाहिये । पूरी तरह सेल्फ़ डिपेंडेन्ट हुए बिना अकेले स्वर्ग में भी कैसे रहेगी ?

    jlsingh के द्वारा
    March 11, 2013

    अब मैं क्या कहूं? एक फेसबुक के लाइन याद आ रही है – जो आदमी अपनी पत्नी से डरता है – सीधा स्वर्ग जाता है और जो पत्नी से नहीं डरता उसके लिए तो यह पृथ्वी(स्त्रीलिंग) ही स्वर्ग है!… प्रणाम महोदय!

    amita neerav के द्वारा
    March 19, 2013

    शाहीजी आप मुझे माफ करें, लेकिन किसी के साथ बाहर जाने पर तो उस बेचारी के साथ ये हुआ… अकेली होती तो शायद उसी वक्त मार दी जाती। औरतें अकेले बाहर आ रही है, इसलिए तो उसे ये सब सहना पड़ रहा है। यदि औरत के साथ कुछ होता है, तो क्या उसके लिए उसे मर जाना चाहिए… आखिर उसकी गलती क्या है भाई? भारतीय स्त्री की उड़ान ही तो नहीं सही जा रही है, आपके समाज से… सेल्फ डिपेंडेंट होने के लिए परिस्थितियाँ ऐसी दी है क्या? बड़ा कंफ्यूज का कमेंट है आपका… यदि पश्चिम की औरतें अघटित को लेकर बहुत निर्लिप्त हैं तो भी आपको तकलीफ़ है और हमारी औरतें पीड़ित है तो भी आपको तकलीफ है। :(

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 19, 2013

    मुझे कोई तक़लीफ़ नहीं है । अब मैं काफ़ी खुश हूँ, आपकी इस्माइली की भंगिमा देखकर । धन्यवाद ।


topic of the week



latest from jagran