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यहाँ सादगी अश्लील शब्द और भूख गैर-जरूरी मसला है

पोस्टेड ओन: 23 Jan, 2012 Junction Forum, जनरल डब्बा, सोशल इश्यू में

शादियों का सिलसिला शुरू हो चला है और अपनी बहुत सीमित दुनिया में भी लोग ही बसते हैं तो उनके यहाँ होने वाले शादी-ब्याह में हम भी आमंत्रित होते हैं… फिर मजबूरी ही सही, निभानी तो है…। हर बार किसी औपचारिक सामाजिक आयोजन में जाने से पहले तीखी चिढ़ के साथ सवाल उठता है कि लोग ऐसे आयोजन करते क्यों हैं? और चलो करें… लेकिन हमें क्यों बुलाते हैं? इस तरह के आयोजनों में जाने से पहले की मानसिक ऊहापोह और अलमारी के रिजर्व हिस्से से निकली कीमती साड़ी की तरह की कीमती कृत्रिमता का बोझ चाहे कुछ घंटे ही सही, सहना तो होता ही है ना… ! बड़ी मुश्किल से आती शनिवार की शाम के होम होने की खबर तो पहले सी ही थी, उस पर हुई बारिश ने शाम के बेकार हो जाने की कसक को दोगुना कर दिया। शहर के सुदूर कोने में कम-से-कम 5 एकड़ में फैले उस मैरेज गार्डन तक पहुँचने के दौरान कितनी बार खूबसूरत शाम के यूँ जाया हो जाने की हूक उठी होगी, उसका कोई हिसाब नहीं था।
उस शादी की भव्यता का अहसास बाहर ही गाड़ियों की पार्किंग के दौरान हो रही अफरातफरी से लगाया जा चुका था। गार्डन में हल्की फुहारों से नम हुई कारपेट लॉन में पैर धँस रहे थे। गार्डन का आधा ही हिस्सा यूज हो रहा था और प्रवेश-द्वार से स्टेज ऐसा दिख रहा था, जैसे बहुत दूर कोई कठपुतली का खेल चल रहा हो।
शुरूआती औपचारिकता के बाद हमने देखने-विचारने के लिए एक कुर्सी पकड़ ली थी… आते-जाते जूस, पंच और चाय का आनंद उठाते लकदक कपड़ों, गहनों में घुमते-फिरते लोगों को देखते रहे। करीब 60 फुट चौड़े स्टेज पर दुल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने के लिए कतार में खड़े लोगों को देखकर हँसी आई थी… यही शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ देने वाले कतार बनाकर खड़े हों… वो भी आशीर्वाद और बधाई जैसी अमूल्य चीज… यही दुनिया है…।
खाने में देशी-विदेशी सभी तरह के व्यंजनों के स्टॉल थे… कहीं पहुँच पाए, कहीं नहीं… पता नहीं ये थकान होती है, ऊब या फिर खाना खाने का असुविधाजनक तरीका… घर पहुँचकर जब दूध गर्म करती हूँ… हर बार सुनती हूँ कि – ‘शादियों में बैसाखीनंदन हो जाती हो…।’ बादाम का हलवा ले तो लिया, लेकिन उसकी सतह पर तैरते घी को देखकर दो चम्मच ही खाकर उसे डस्टबिन में डाल दिया… फिर अपराध बोध से भर गए… यहाँ हर कोई हमारी ही तरह हरेक नई चीज को चखने के लोभ में क्या ऐसा ही नहीं कर रहा होगा? तो क्या देश की 38 प्रतिशत आबादी की भूख केवल मीडिया की खबर है…? यहाँ देखकर तो ऐसा कतई नहीं लगता कि इस देश में भूख कोई मसला है, प्रश्न है…।
विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शहर के बड़े व्यापारी, उद्योगपतियों का आना-जाना चल रहा था, कीमती सूट-शेरवानी में मर्द और महँगी चौंधियाती साड़ियों और सोने-हीरे के जेवरों में सजी महिलाओं के देखकर यूँ ही एक विचार आया… कि जिस तरह नेता रैली, बंद, धरने, हड़ताल और जुलूस के माध्यम से अपना शक्ति-प्रदर्शन करते हैं, उसी तरह अमीर, शादियों में अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं… किसके यहाँ कौन वीआईपी गेस्ट आए… कितने स्टॉल थे, कितने लोग, मैन्यू में क्या नया और सजावट में क्या विशेष था… संक्षेप में शादी का बजट किसका कितना ज्यादा रहा… यहाँ शक्ति को संदर्भों में देखने की जरूरत है। कुल मिलाकर इस दौर में जिसके पास जो है, वो उसका प्रदर्शन करने को आतुर नजर आ रहा है, मामला चाहे सुंदर देह और चेहरे का हो, पैसे का, ताकत का या फिर बुद्धि का… यहाँ सादगी एक अश्लील शब्द, भूख-गरीबी गैर जरूरी प्रश्न है तो जाहिर है कि प्रदर्शन को एक स्थापित मूल्य होना होगा, हम लगातार असंवेदना… गैर-जिम्मेदारी और अ-मानवीयता की तरफ बढ़ रहे हैं… बस एक चुभती सिहरन दौड़ गई…।

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

viplavimayank के द्वारा
January 26, 2012

गतानुगतिको लोके न लोके पारमार्थिक:…आदरणीय अमिता जी केवल शादियाँ ही नहीं वरन ऐसे न जाने कितने आयोजन हैं जिन्हें केवल गरीबों का मखौल उड़ाने के लिए ही किया जाता है|संस्कृत में एक कहावत है…वैभवं,धन,संपत्ति:,प्रभुत्वंअविवेकता, एकैकमप्यनर्थाय, किमु एकत्र चतुष्टयम||अर्थात वैभव, धन, संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इनमे से प्रत्येक अनर्थकारी है|जहाँ ये चारों एकत्रित हो वहां कहना ही क्या?खेद का विषय है की आज हम इन बातों को सुनना ही नहीं चाहते|एक बहुत ही बेहतरीन आलेख बधाई|

akraktale के द्वारा
January 24, 2012

अमिता जी नमस्कार,
बिलकुल ही दुरुस्त बात आपने कही है. विवाह समारोह सम्पन्नता के प्रदर्शन का स्थल बन गया है.फिर सादगी क्या है आपकी आर्थिक कमजोरी, और भूख? किसको! जिसके चारों तरफ खाना बिखरा पडा है.उसको क्या पता की कोई उनकी फेंकी झूठन को भी दो दिन और जीने के लिए खायेगा. बहुत विचारणीय आलेख. साधुवाद.

    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    हाहाहा… ये आपको अच्छा लगा… :-)
    अब इस बात पर तो सोचने का कोई मतलब ही नहीं है कि सादगी जैसी कोई चीज भी हुआ करती है…। बाजार की चमक-दमक ने इस तरह की सौंधी-सौंधी भावना, व्यवहार छिन लिए हैं…।

dineshaastik के द्वारा
January 24, 2012

आदरणीय अमिता जी सादर प्रणाम।
बहुत अच्छे प्रश्न उठाये हैं आपने, किन्तु इस अर्थ युग में ये सभी प्रश्न गौढ़ होते जा रहे हैं।
चिन्तनीय एवं अफसोस जनक है।
आपकी व्यथा का मैं पूर्णतः समर्थन करता हूँ।
कृपया इसे भी पढ़े–
“क्या यही गणतंत्र है”
“आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2″
http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    चाहे गौण हों, लेकिन क्या जरूरी नहीं है ये सवाल… ?

Rajkamal Sharma के द्वारा
January 23, 2012

आदरणीय अमिता जी …..सादर अभिवादन !
आपका यह लेख पढ़ने के बाद उस रजा की बात याद हो आई जिसने की पार्टी में ही आमिर महिलाओं को देखने के बाद उनके व्यवसायी पतियो पर भारीभरकम टेक्स लगा दिए थे ……
ऐसे लोगों की पार्टियों में इनकम टेक्स वाले आ जाए तो यह अपने असली गहनों को भी नकली बताए (गिफ्ट फ्राम राजकमल )
हा हा हा हा हा हा हा हा हा
सुन्दर रचना पर मुबारकबाद
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    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    हाहाहा… हमेशा की तरह लाजवाब… :-)

sinsera के द्वारा
January 23, 2012

अमिता जी , आप की बात बिलकुल सही है, लेकिन यहाँ पर परिचर्चा में भाग लेने वाले शादीशुदा अपनी शादी में यह सब कर चुके हैं, और कुंवारे इस से भी आगे बढ़ कर करने की चाह रखते हैं. बात तो तब बने गी जब लोग ऐसे फ़िज़ूल खर्चों की कटौती कर सकें…ताकि पेट भरों / भूखों का अनुपात सही हो सके..
सार्थक लेख…

    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    हाँ ये सही है कि हरेक अपने-अपने जीवन के इस अद्भुत पल को यादगार बनाना चाहता है। यूँ ये भी बुरा नहीं है, लेकिन मामला जब भौंडे प्रदर्शन का (इसकी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे वाला) हो तो फिर ये न सिर्फ अनैतिक लगने लगता है, बल्कि अश्लील भी… आखिर तो हमें कुछ तो जिम्मेदारी दिखानी चाहिए ना…!

anandpravin के द्वारा
January 23, 2012

अनिता जी, नमस्कार
आपने एक योग्य प्रश्न उठाया है, किन्तु सवाल ये है की व्यक्ति के मौलिक जीवन में यदि शादिया ना हो या उसमें भव्यता ना हो तो जीवन कुछ अधूरा सा लगता है,
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसे अपने ही समाज के अनुरूप रहना पड़ता वो हमेसा ये कोशिश करता है की वो अपने समाज में किस प्रकार श्रेष्ट बन सके, और इसी कोशिश में वो इन प्रकार के कामों को अंजाम देता है,
मैं इस बात का पछ नहीं ले रहा पर मैंने वास्तिविकता बताई
बहुत ही सुंदार लिखी और वास्तविक चेहरे को दर्शाती लेख को मेरा सलाम

    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    ओओ…. अनिता नहीं अमिता…. :-)
    शादियाँ या फिर सामाजिक आयोजन तो हो, लेकिन समृद्धि का इस तरह से अश्लील प्रदर्शन न हो। आखिर तो आयोजनों का लक्ष्य आनंद है, न कि दिखावा, अब सोचें… :-)

Amar Singh के द्वारा
January 23, 2012

सही कहा अमिता जी, प्रदर्शन की इस भावना ने मध्यम और निम्न वर्ग पर बहुत ही बूरा प्रभाव डाला है. दहेज़ प्रथा कई अन्य समस्याओं की जड़ है जैसे कन्या भ्रूण हत्या, बहुयो की हत्या इत्यादि. इस प्रकार की बहुत सी समस्याए है जो दहेज़ से ही जुडी है.
http://singh.jagranjunction.com/2012/01/21/%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A3-%E0%A4%B9/

    amita neerav के द्वारा
    January 25, 2012

    सही है, और यहीं से कन्या भ्रूण हत्या जैसी वीभत्सता भी… :-(




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