अस्तित्व विचारशील होने का अहसास

ये जीवन के अनुभव, विचार, दर्शन और कभी-कभी कहानी के तौर पर अभिव्यक्ति है, बस...।

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ज़हन और दिल पर क़ाबिज बाज़ार

Posted On: 15 Dec, 2011 Others,मेट्रो लाइफ में

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रात को कितनी ही जल्दी क्यों न करें सोते-सोते 11.30 हो ही जाती है, लिहाजा सुबह जब नींद खुलती है तो सूरज खिड़कियों पर दस्तक दे रहा होता है। कुमारजी श्याम बजा बाँसुरिया सुना रहे होते हैं और चाय के प्याले के साथ सुबह के अखबार हुआ करते हैं, जिनमें ज्यादातर निगेटिव खबरें होती हैं…। लगभग हर सुबह का यही क्रम हुआ करता है। और हर दिन की शुरुआत अखबारों में छपी खबरें और विज्ञापन देखते-देखते मन के उद्विग्न हो जाने से होती है। यूँ लगता है कि या तो दुनियाभर में बस सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है या फिर लगता है कि हमारे आसपास बस अभाव ही अभाव है… सुबह पूरी तरह नकारात्मकता से पगी हुई, तो दिनभर का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अच्छा खासा बड़ा, खुला, रोशन और हवादार घर है, लेकिन अखबार में छपने वाले फ्लैट के लुभावने विज्ञापन अहसास दिलाते हैं कि साहब आपके पास तो वॉकिंग जोन, स्विमिंग पुल, कम्युनिटी हॉल वाली टाउनशिप में कोई फ्लैट नहीं है औऱ यदि वो नहीं है तो फिर आपके जीवन में एक बड़ा अभाव है। स्लिमिंग सेंटर के विज्ञापनों में एक हड्डी की मॉडल देखकर लगता है कि कमर और पेट पर कितनी चर्बी चढ़ रही है और ब्यूटी पार्लरों के विज्ञापन चेहरे पर उम्र के निशान दिखाने लगते हैं किसी कॉस्मेटिक सर्जन के विज्ञापन पढ़कर चेहरे की सामान्य बनावट में कमी नजर आने लगती है और कभी लगता है कि यदि डिंपल होता तो शायद चेहरा खूबसूरत होता… किसी सेल का विज्ञापन घरेलू सामानों के अभाव को तो कपड़ों के विज्ञापन नए डिजाइन, पैटर्न आदि के कपड़ों का अभाव अलग तरह के मन को उदास करता है, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, म्यूजिक सिस्टम, गाड़ी, एयरकंडीशनर, मोबाइल, लैपटॉप आदि यदि नए भी खऱीदे हो तो लगता है कि टेक्नॉलॉजी पुरानी हो गई है। तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं…। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। कभी-कभी तो विज्ञापन ये भ्रम तक दे डालते हैं कि हो ना हो, हमें कोई-न-कोई बीमारी जरूर है। और ये सिलसिला रूकता ही नहीं, अखबार से शुरू होकर दफ्तर तक और दफ्तर से घर लौटकर रात को टीवी देखने तक ये बदस्तूर जारी रहता है।
घर से दफ्तर के बीच एक पूरा लंबा-चौड़ा बाजार पसरा हुआ है जिनमें सामानों की शक्ल में अलग-अलग आकार-प्रकार-रंग और पदार्थों के सपने टँगे होते हैं। आते-जाते ये सपने आँखों में उतर जाते और जिंदगी बस इन्हीं सपनों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती सी लगती है। चौराहे के सिग्नल पर जब गाड़ी खड़ी थी, तभी पास में मायक्रा आकर रूकी… कितनी खूबसूरत गाड़ी है…! एक ठंडी आह निकली। शो-रूम पर हर दिन आते-जाते मेजेंटा रंग की ड्रेस पर ध्यान अटकता और हर दिन वो सपना जमा होता चला जाता है, बल्कि हर दिन कोई नया सपना साथ आता है। इनमें से कई पूरे किए, लेकिन ये फेहरिस्त कम होने का नाम ही नहीं लेती। इंटरनेट पर सर्फ करो तो पेंशन प्लान से लेकर गर्ल फॉर डेंटिंग तक और डायमंड ज्लैवरी से लेकर निवेश के विकल्पों को सुझाने वाले विज्ञापन… टीवी पर डिटर्जेंट से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक और टीवी से लेकर बैंकिंग तक हर चीज का विज्ञापन शाम का समय खा जाता है… गोया बस हर जगह बाजार लगा हुआ है, खरीदो-बेचो… खरीदो-बेचो…।
कभी-कभी तो अपना आप भी बाजार का ही हिस्सा लगने लगता है। आखिर तो किसी भी वक्त खुद को बाजार से बाहर निकाल पाने की मोहलत ही नहीं मिलती है। हर वक्त कोई न कोई जरूरत की चीज याद आती है, कोई न कोई कमी, कोई न कोई सपना… क्या हम उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिनिधि उदाहरण हैं? कभी-कभी तो लगता है कि सोते-जागते, हँसते-गाते, खाते-पढ़ते… पूरे समय दिमाग पर बाजार ही हावी रहता है। हो भी क्यों न…! यदि हम घर पर भी रहे तो अखबार, टीवी और इंटरनेट हर जगह बाजार पसरा मिलता है। लगता है कि एक पल को भी बाजार से मुक्ति नहीं है। देखते ही देखते बाजार न सिर्फ हमारे घरों तक आ पहुँचा है, बल्कि इसने हमारे उपर कब्जा कर लिया। अब बस खऱीदने और पुरानी चीजों को निकालने के अतिरिक्त और कोई विचार होता ही नहीं है, लगता है कि बस खऱीदो-बेचो, खऱीदो-बेचो यही है जीवन का ध्येय…।
दिसंबर मध्य में जब सर्दी ने अपनी आमद दर्ज करवा दी है। रात में हल्की धुँध-सी महसूस होती है और रजाई की गर्माहट शिराओं को और मेहंदी हसन की किसी अँधेरी खोह से आती आवाज में – मेरी आहों में असर है कि नहीं, देख तो लूँ… के तल दिमाग के तंतु जब शिथिल होने लगे, तब एक होशमंद विचार कौंधा कि बाजार असल में होश पर ही नहीं, बल्कि जहन और दिल तक पर काबिज़ हो गया है तभी एक सवाल उठा तो क्या बाजार से मुक्ति नहीं हैं?
जवाब मेरे पास नहीं है, क्या आपके पास है!



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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chandanrai के द्वारा
February 29, 2012

आपके शब्द प्राण की तरह है अपने मार्गदर्शन की की कृपा बनाये रखिये

dineshaastik के द्वारा
January 28, 2012

सचमुच कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जिन्दगी ही बाजार बन गई है। अत्यधिक प्रभावित करने वाला आलेख……..बधाई……. कृपया इसे भी पढ़े- क्या यही गणतंत्र है http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/01/17/%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%87/

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
January 23, 2012

अमिता जी, बहुत बढ़िया लेख सच कहा आप ने चारों तरफ बाजार ही बाजार है , सामान तो सामान है आज आदमी भी विज्ञापन बन गया है . दुनिया तो बाजार है , यहाँ सब कुछ बिकता है l इंसानों का मोल नहीं ,यहाँ भ्रष्टाचार भी बिकता है l

    amita neerav के द्वारा
    January 23, 2012

    हाहाहा… सही है इंसान और उसकी जान की कम-अस-कम हमारे यहाँ कोई मोल नहीं है। हाँ, लेकिन इंसान का ईमान बिकाऊ है। :-(

manoranjanthakur के द्वारा
January 22, 2012

सवाल दर सवाल है की यह इंकलाब लायेगा कौन सुंदर रचना

    amita neerav के द्वारा
    January 23, 2012

    इंकलाब की तो हमारे यहाँ रत्ती मात्र संभावना नहीं बची है। ये प्रवाह है और सब कुछ को डूबना ही है… देखें क्या ऐसा होगा जो इस प्रवाह को सूखा पाएगा। क्योंकि रोकना तो उल्टा काम करेगा ना…!

RAJESH KOTWAL के द्वारा
January 22, 2012

सच ही कहा आपने … चारों तरफ बाज़ार पसरा है,बाथरूम में पानी की टंकी हो या चाय का प्याला हर जगह बाज़ार दिखता है| बाज़ार में स्वेटर खरीदने जाते हैं तो उनकी विविधता वो भी खीचती है| पर जेब और बाज़ार का अपना दायरा है| पिसते जा रहे हैं हम बढता जा रहा है बाज़ार| बेहतरीन !!!!!!! http://swatantra.jagranjunction.com/2012/01/22/inhe-rok-lo/ कृपया मेरी इस रचना को पढने का कष्ट करे

krishnashri के द्वारा
December 19, 2011

महोदया, आपका लेख एवं प्रश्न आज की स्थिति ,परिस्थिति को उकेरता है . विचार शील आलेख ,इस वैचारिक झंझावत से उबरने का एक ही रास्ता है , गाँधी जी एवं बुद्ध के सिद्धांतों का पालन . धन्यवाद

bharodiya के द्वारा
December 17, 2011

जी हां, जवाब तो है लेकिन अभी जवाब देने का मतलब नही । चीजों का अंत होता ही है । ईस अति का क्लाईमेक्स चल रहा है, ईस के बाद केथार्सिस आएगा । फीर जवाब देने की जरूरत भी नही रहेगी । अपने आप ही सब ठीक हो जायेगा । तब तक किशोर कुमार का गाना सुनिये–ये जीवन है ईस जीवन का यही है यही है ………

    amita neerav के द्वारा
    December 17, 2011

    सही है, लेकिन तब तक…. क्या… ??? :-P

RaJ के द्वारा
December 16, 2011

जिंस के मानिंद, आदमी यहाँ बिकने लगा है प्यार मोहब्बत का मोल भी, बाज़ार तय करने लगा है

    amita neerav के द्वारा
    December 17, 2011

    सही है, यहाँ हर चीज अब बिकने लगी है…

akraktale के द्वारा
December 16, 2011

मुझे नहीं मालुम की इंसान के जेहन में नकारात्मक विचार कहाँ से आते हैं.जब किशोर और मुकेश के गीत बज रहे हों तो लोग क्यों मुकेश को सुनते हैं.जैसे आपने कहा सुबह से अखबार में नकारात्मक खबरें होती हैं.मेरे अखबार में तो सभी सकारात्मक ख़बरें ही आती हैं.हर दिन भविष्यफल में लिखा होता है आज का दिन शुभ है क्योंकि आज फिर सूरज पूरब से उगा है.अखबार में विज्ञापन पढ़कर लगता है की अब तो कॉफ़ी पिने की आवश्यता ही नहीं है.जब किसी टाउनशिप में मकान की कीमत पढता हूँ तो लगता है अब तक लाखों के मकान में रह रहे थे आज से करोड़ों के मकान में रहेंगे.वैसे ही जब टीवी, फ्रिज या वाशिंग मशीन के विज्ञापन पर नजर जाती है और उसमे कही एक वर्ष और कहीं छः महीने की वारंटी देखता हूँ तो सीना गर्व से फूल जाता है की ये सभी चीजें मेरे पास आज दस वर्षों से बिना गारंटी के भी कोई शिकायत नहीं कर रही. टीवी पर जब विज्ञापन आते हैं तब तो मै चेनल बदलने में ही व्यस्त रहता हूँ तो उनका प्रश्न ही नहीं उठता. हाँ,फिरभी कहता हूँ बाजार है विज्ञापन है असर तो करते ही हैं किन्तु विचलित नहीं करते. वरना तो किराने वाला हर दिन नए साबुन से नहाता हर दिन नया पेस्ट उपयोग में लाता और इलेक्ट्रोनिक्स शॉप वाला हर दिन अपने घर में टीवी बदल देता.किन्तु ऐसा होता नहीं है. और भी गम है जमाने में एक तेरे गम के सिवा.

    jlsingh के द्वारा
    December 17, 2011

    अशोक जी, नमस्कार! आपके विचारों और व्यवहारों से मैं पूर्णत: सहमत हूँ. सचिन जी ने विज्ञापन से ‘हामिद का चिमटा’ निकाल लिया…..जाकी रही भावना जैसी… वैसे लेख में केवल अमिता जी के विचार नहीं हो सकते. अक्सर लोगों में आकाश छूने की ललक या कहें ‘तृष्णा’ होती है, और इसे जीत पाना हर किसी के वश की बात नहीं होती. साभार – जवाहर

    amita neerav के द्वारा
    December 17, 2011

    अशोकजी हेट्स ऑफ टू यू… हमेशा ही आपकी सकारात्मकता की प्रशंसक रही हूँ। उन लोगों को भी आपके रेफरेंस देती हूँ, जो आपको नहीं जानते हैं। मुझे आश्चर्य है कि आपमें इतनी सकारात्मकता आती कहाँ से हैं? हाँ कभी-कभी आप जैसे लोगों से ईर्ष्या भी होती है कि आप वैसे और मैं ऐसी क्यों हूँ ;-) अपना सोर्स बताइए… यहाँ बड़ी जरूरत है। आपकी प्रतिक्रियाएँ जीवन को देखने के लिए नई दृष्टि देती है… ऐसे ही बने रहें, ईश्वर से मेरी प्रार्थना है… :-)

roshni के द्वारा
December 16, 2011

अमिता जी बहुत अच्छा लिखती है आप .. इस बार भी बहुत बढ़िया लेख ..

    amita neerav के द्वारा
    December 17, 2011

    मेरे ब्लॉग तुम पढ़ती हो, ये जानकर अच्छा लगा और प्रशंसात्मक टिप्पणी के लिए शुक्रिया। कभी असहमत हो तब जरूर बताना, ये बहुत ज्यादा जरूरी है। ;-)

omdikshit के द्वारा
December 16, 2011

अमिता जी ,सुंदर लेख.समाचार-पत्र हो या चैनल केवल,प्रचारही प्रचार.

    amita neerav के द्वारा
    December 17, 2011

    बहुत धन्यवाद ओमजी… :-)

minujha के द्वारा
December 16, 2011

अमिता जी नमस्कार आपकी हर रचना की तरह ये रचना भी जिंदगी की हकीकतों से रूबरू कराती है, बाजार ने हमारे दिलो-दिमाग पर कब्जा जरूर किया है,पर इसके उस  योगदान को हम कैसे भूल सकते है जिसके तहत  इसने बहुत हद तक भौतिकवादी मामलों में हमारे जीवन को सरल से सरलतम बना दिया है(माफ कीजिएगा प्रबंधन की छात्रा रही हुं ना इसलिए बाजार की वकालत करना मेरा धर्म है,वैसे कुछ हद तक सही भी है)

    amita neerav के द्वारा
    December 16, 2011

    मीनूजी इस उपभोक्ता और बाजारवादी संस्कृति ने जितना मानवता का नुकसान किया है, उतना अब तक सिर्फ धर्म और राजनीति ने ही किया है। ये एक मान्य सत्य है कि संतोष ही जीवन का धन है औऱ ये बाजार इसी धन को सबसे पहले लूटता है। जैसा कि गाँधी जी ने कहा था कि – प्रकृति के पास हर इंसान की जरूरत पूरा करने की कूव्वत है, लेकिन वह एक भी इंसान की हवस को पूरा नहीं कर सकती है। तो बाजार सिर्फ हवस पैदा करता है, सपने दिखाता है और हमें अशांत औऱ असंतुष्ट रहने के लिए छोड़ देता है। और आप मुझे ये कहने के लिए माफ करेंगी कि प्रबंधन ने इंसान की सृजनशीलता को नष्ट कर दिया है। अब सिर्फ मैनेजमेंट ही मैनेजमेंट होता है, प्रोडक्शन के बारे में कोई नहीं सोचता…। मैं भी राजनीति विज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ, इसीलिए आज मुझे सबसे ज्यादा कोफ्त राजनीति से ही होती है। तो जरा कंफर्ट कोर्ट बदल कर देखिए विचारों में भी बदलाव मिलेगा… :-D टिप्पणी के लिए शुक्रिया…

Santosh Kumar के द्वारा
December 16, 2011

शायद हमारी मानसिकता ही बाजारू हो गयी है ,..बाजार लोभ अवश्य पैदा करते हैं लेकिन तृष्णा हमारे अन्दर से उपजती है ,..कह सकता हूँ ,….मैं इनसे दूर हूँ ,…कभी कभी कमी अवश्य महसूस हो जाती है लेकिन ना होने का आनंद अलग ही है ,..अद्भुत आनंद….. कभी महसूस हो तो अवश्य बताइयेगा …… गुरुदेव की बात सोलह आना सच है ,..आपकी रचनाओ में कोई कमी नहीं हो सकती …सादर आभार

    amita neerav के द्वारा
    December 16, 2011

    संतोष जी, आप बेहद खुशकिस्मत है जो बाजार के शिकंजे से दूर है… मेरी जैसी अस्थिर मानसिकता में तो ये दूर-दूर तक संभव नहीं लगता है। बाजार तो नींद तक को जकड़े हुए हैं… जब कभी उस आनंद का अनुभव हुआ तो आपसे जरूर शेयर करूँगी… धन्यवाद…

    bharodiya के द्वारा
    December 17, 2011

    सन्तोषभाई बाजार से दूर रहने में ही भलाई है पर जब बीवी-बच्चे मख्खीचूस कहने लगते हैं तब तकलिफ हो जाती है ।

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 15, 2011

तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं…। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। आदरणीय अमिता जी ….. सादर अभिवादन ! एक चीज ऐसी है जिसमे की आपको कोई भी कमी नजर नहीं आ सकती है ? ! ? ! आपकी रचनाये !!!!!!!!!! हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    amita neerav के द्वारा
    December 16, 2011

    हाहाहा… :-D :-D :-D ये आपका बड़प्पन है… वरना तो अभी तक तो वैसा ही नहीं लिख पा रही हूँ, जिसे मैं खुद अच्छा कह सकूँ… :-C

shashibhushan1959 के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय अमिता जी, सादर. जवाब तो नकारात्मक ही है ! हल एक ही है की आदमी टी० वी० न देखे. जो की संभव नहीं है. नेट न चलाये. सड़क किनारे के होर्डिंग को न देखे, आँख बंद कर, कुँए के मेढ़क की तरह एक जगह पड़े रहें, सड़े रहें ! मेरी समझ से तो इस जबरदस्ती का कोई उपाय नहीं है. आभार !

    amita neerav के द्वारा
    December 16, 2011

    सुशील जी सवाल तो ये है कि आदमी क्या-क्या न करें… आखिर तो दुनिया दारी का हिस्सा ही हैं हम भी। खैर टिप्पणी के लिए शुक्रिया…

December 15, 2011

अमिता जी, सादर नमस्कार ! आपकी हर पोस्ट अंतस में झाँकने को मज़बूर कर देने वाली होती है । ठीक उसी तरह ये भी….बहुत ही उम्दा…..हजारों ख़्वाहिशें ऐसी कि…..हर ख़्वाहिश पर दम निकले । सादर आभार….हार्दिक बधाई !! :)

    amita neerav के द्वारा
    December 16, 2011

    सही है ग़ालिब ने सौ साल पहले ही सही, लिखा बड़ा कालजयी था… लेकिन इन दिनों विज्ञापन और बाजार ने मिलकर हमारी मौलिक शांति ही छीन ली। मेरा लिखा पसंद आता है, तो लगता है कि यही रिवार्ड है…. :-D

amita neerav के द्वारा
December 17, 2011

वैसे मैं आपके और अशोकजी के बीच खामख्वाह ही अपना सिर डाल रही हूँ, लेकिन चूँकि अमिताजी का नाम आया, इसलिए उनकी टिप्पणी भी बहुत जरूरी हो जाती है :-P ये सही है कि ये सिर्फ मेरे ही विचार नहीं है, ये अमूमन हर इंसान की मनस्थिति होगी, ऐसा मैं मानकर चल रही हूँ। औऱ ये मेरा सच है कि मुझे बाजार बहुत लुभाता है साथ ही इससे कोफ्त भी होती है… ये क्या है, अभी तक समझ नहीं पाई हूँ :-(

amita neerav के द्वारा
December 17, 2011

आप तो संतोषजी से बात कर रहे हैं… मैं यूँ ही खामख्वाह… :-D


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